रायपुर। कभी जंगलों से शहद निकालकर गांव-गांव और हाट बाजारों में बेचने वाली महिलाओं ने आज अपनी मेहनत से बोड़ला को देशभर में नई पहचान दिला दी है। कबीरधाम जिले के बोड़ला में तैयार होने वाला ‘बोड़ला हनी’ अब सिर्फ छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के बड़े बाजारों के साथ विदेशों तक भी पहुंचने लगा है। स्थिति यह है कि देश में बिकने वाली हर पांचवीं शहद की बोतल में कवर्धा की मिठास शामिल बताई जा रही है।
साल 2024-25 में ‘बोड़ला हनी’ की बिक्री एक करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर गई। इस सफलता ने वनांचल की महिलाओं की जिंदगी पूरी तरह बदल दी है। बोड़ला स्थित शहद प्रोसेसिंग सेंटर का संचालन जय ठाकुर देव महिला स्व-सहायता समूह द्वारा किया जा रहा है। जंगलों से लाया गया कच्चा शहद यहां आधुनिक मशीनों की मदद से प्रोसेस किया जाता है और फिर बेहतर गुणवत्ता वाले शहद के रूप में बाजार में उतारा जाता है।
पहले महिलाएं बिना पैकेजिंग के खुले में शहद बेचती थीं, जहां मेहनत के मुकाबले बहुत कम कीमत मिलती थी। लेकिन अब यही शहद ‘बोड़ला हनी’ नाम से एक पहचान बना चुका है और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से लेकर बड़े शहरों के बाजारों तक बिक रहा है।
सफलता की इस कहानी में 116 शहद संग्राहकों की बड़ी भूमिका रही। इन संग्राहकों ने 161 क्विंटल से ज्यादा कच्चा शहद इकट्ठा किया। प्रोसेसिंग के बाद 230 क्विंटल से अधिक शहद तैयार हुआ, जिसमें से करीब 196 क्विंटल शहद की बिक्री हो चुकी है। इससे एक करोड़ 64 हजार रुपये से ज्यादा का कारोबार हुआ है। वन विभाग की ओर से संग्राहकों को 225 रुपये प्रति किलो की समर्थन कीमत भी दी जा रही है, जिससे ग्रामीण परिवारों की आमदनी में अच्छा इजाफा हुआ है।
वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, अब ‘बोड़ला हनी’ को जीआई टैग दिलाने की तैयारी की जा रही है, ताकि इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग पहचान मिल सके। विदेशों में निर्यात बढ़ाने के लिए पैकेजिंग और गुणवत्ता को भी वैश्विक मानकों के अनुसार तैयार किया जा रहा है।
आज बोड़ला का यह शहद केंद्र सिर्फ एक उत्पादन इकाई नहीं, बल्कि महिलाओं की आत्मनिर्भरता और जंगल से जुड़ी अर्थव्यवस्था की एक सफल मिसाल बनकर सामने आया है।







