सत्ता की सफ़ेद हाथी गाड़ियाँ: वित्त मंत्री की पहल पर शेष मंत्रिमंडल की चुप्पी क्यों?

Madhya Bharat Desk
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संकट की घड़ी में नेतृत्व वही है जो खुद को उदाहरण के रूप में पेश करे। होर्मुज जलडमरूमध्य में मंडराते युद्ध के बादलों और गहराते वैश्विक तेल संकट के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो अपील की है, वह केवल एक प्रशासनिक सलाह नहीं, बल्कि भविष्य की चुनौतियों के लिए राष्ट्र को तैयार करने की एक ‘रणनीति’ है।

प्रधानमंत्री ने अपने काफिले को आधा कर और इलेक्ट्रिक वाहनों को प्राथमिकता देकर स्पष्ट संदेश दिया है कि परिवर्तन की शुरुआत ‘ऊपर’ से होनी चाहिए। किंतु, छत्तीसगढ़ के संदर्भ में यह संदेश सत्ता के गलियारों में पहुँचते-पहुँचते कहीं थम गया सा लगता है।

छत्तीसगढ़ में केवल वित्त मंत्री ओपी चौधरी की सक्रियता को छोड़ दें, तो राज्य की पूरी मशीनरी—चाहे वह कैबिनेट हो या आला नौकरशाही—इस मुद्दे पर गहरी चुप्पी साधे हुए है। यह खामोशी कई सवाल खड़े करती है।

क्या राज्य के मंत्रियों और अधिकारियों को यह लगता है कि वैश्विक ऊर्जा संकट का असर बस्तर से लेकर सरगुजा तक नहीं पड़ेगा? या फिर लग्जरी गाड़ियों और सुरक्षा के भारी-भरकम काफिले को अपनी प्रतिष्ठा मान लेना ही वर्तमान राजनीति की नियति बन चुकी है?

आज छत्तीसगढ़ की राजधानी और मंत्रालय के बीच का सफर (नवा रायपुर से रायपुर/दुर्ग/बिलासपुर) ईंधन की भारी खपत का गवाह है। आला अफसर, जो नीति निर्धारण करते हैं, यदि वे खुद देवेंद्र नगर या कचना से मंत्रालय आने के लिए सार्वजनिक परिवहन या कार-पूलिंग को नहीं अपनाएंगे, तो आम जनता से तेल बचाने की उम्मीद करना बेमानी होगा।

‘वीआईपी कल्चर’ की जड़ें हमारे प्रशासन में इतनी गहरी हो चुकी हैं कि प्रधानमंत्री की स्पष्ट नसीहत के बावजूद अधिकारियों को बस या इलेक्ट्रिक गाड़ियों में सफर करना शायद अपनी ‘तौहीन’ लगता है।

सवाल केवल ईंधन बचाने का नहीं है, सवाल नियत का है। जब देश का प्रधानमंत्री अपनी सुरक्षा (SPG) की गाड़ियों में 50 फीसदी की कटौती कर सकता है, तो छत्तीसगढ़ के मंत्रियों को अपने काफिले की संख्या घटाने में क्या झिझक है? क्या दुर्ग, भिलाई या बिलासपुर से आने वाले माननीयों के लिए यह संभव नहीं कि वे एक ही वाहन का साझा उपयोग करें या इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनी पहली पसंद बनाएं?

छत्तीसगढ़ सरकार को समझना होगा कि संकट की आहट होने पर ‘वेट एंड वॉच’ (Wait and Watch) की नीति आत्मघाती होती है। यदि गुजरात, असम और अन्य राज्य इस दिशा में त्वरित कदम उठा सकते हैं, तो छत्तीसगढ़ में यह हिचकिचाहट क्यों? वित्त मंत्री की पहल को एक ‘एकाकी प्रयास’ रहने देने के बजाय इसे पूरी सरकार की नीति बनना चाहिए।

अंततः, लोकतंत्र में जनता वही करती है जो उसके नायक करते हैं। यदि छत्तीसगढ़ का नेतृत्व आज सादगी और मितव्ययिता का उदाहरण पेश नहीं करेगा, तो कल ऊर्जा संकट के दौर में जनता को उपदेश देने का नैतिक अधिकार भी खो देगा। अब समय ‘शाही’ रफ़्तार को थामने और ‘साझा जिम्मेदारी’ को निभाने का है।

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