आदिवासी मुख्यमंत्री और अधिकारी, फिर भी आदिवासियों को ही पड़ा सिस्टम की मार!

Madhya Bharat Desk
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आदिवासी मुख्यमंत्री की नियुक्ति को लेकर जब छत्तीसगढ़ में राजनीतिक माहौल बना था, तब इसे एक बड़े बदलाव और उम्मीदों से जोड़कर देखा गया था। छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सहित अधिकांश मंत्री, विधायक और निगम-मंडलों के अध्यक्ष आदिवासी वर्ग से आते हैं। ऐसे में यह उम्मीद जताई जा रही थी कि राज्य के दूरस्थ इलाकों में रहने वाले गरीब आदिवासियों की स्थिति में सुधार होगा और उन्हें बेहतर सुविधाएं मिलेंगी।

पर हुआ बिल्कुल इसके विपरीत है कुछ आदिवासी अधिकारी ही इन गरीब और जरूरतमंद आदिवासियों के हक पर असर डाल रहे हैं। आरोप है कि उन्हें अच्छी गुणवत्ता का राशन देने के बजाय सड़ा-गला चावल परोसा जा रहा है।

जिस व्यवस्था से गरीबों को सम्मान के साथ राशन और खाद्य सामग्री मिलनी थी, उसी व्यवस्था में गड़बड़ी और लापरवाही की शिकायतें सामने आने लगीं। जिस सिस्टम से भला होने की उम्मीद थी, वहीं अब भोजन की गुणवत्ता को लेकर सवाल खड़े कर रहे है।

आरोपों के केंद्र में नान (नागरिक आपूर्ति निगम) के निलंबित क्वालिटी इंस्पेक्टर इरॉड टोप्पो का नाम लिया जा रहा है। फिलहाल वे कोंडागांव जिला कार्यालय में तकनीकी सहायक के रूप में निलंबन अवधि में अटैच हैं। उनके कार्यकाल से जुड़े मामलों को लेकर दक्षिण बस्तर से लेकर पूरे प्रदेश में चर्चाएं और सवाल लगातार उठते रहे हैं।

दंतेवाड़ा में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के गोदामों में कथित रूप से खराब और सड़े-गले चावल के भंडारण और वितरण को लेकर जब मीडिया और राजनीतिक स्तर पर सवाल उठे, तो मामला और भी सुर्खियों में आ गया। विपक्षी दल कांग्रेस का कहना है कि इस पूरे प्रकरण में जिम्मेदार अधिकारियों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई है।

स्थानीय अखबारों में भी इस मुद्दे को प्रमुखता से जगह मिली, लेकिन प्रशासनिक कार्रवाई की रफ्तार उतनी तेज नहीं दिखी जितनी उम्मीद की जा रही थी। छह महीने बीत जाने के बाद भी न तो स्पष्ट अनुशासनात्मक कार्रवाई सामने आई है और न ही FIR दर्ज होने को लेकर स्थिति साफ हो पाई है।

ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि जब व्यवस्था पर सवाल इतने तेज़ हैं, तो कार्रवाई की गाड़ी आखिर किस गति से चल रही है और क्या फाइलें सच में आगे बढ़ रही हैं या सिर्फ कागजों में गुणवत्ता जांची जा रही है।

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