डिप्टी सीएम के विधानसभा क्षेत्र में अफसरशाही बेलगाम!

Madhya Bharat Desk
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छत्तीसगढ़ के डिप्टी सीएम अरुण साव भले ही मंचों से सुशासन और जनता की सेवा के बड़े-बड़े दावे करते हों, लेकिन उनके खुद के विधानसभा क्षेत्र लोरमी की हकीकत उन दावों का मजाक उड़ाती नजर आ रही है।

लोरमी तहसील में पिछले डेढ़ महीने से हालात ऐसे हैं मानो यहां प्रशासन नाम की कोई चीज बची ही नहीं। तहसीलदार साहब कब आते हैं, कब जाते हैं, किसी को पता नहीं। जनता सुबह से शाम तक फाइलें लेकर बैठी रहती है, लेकिन सुनवाई के नाम पर सिर्फ अगली तारीख थमा दी जाती है।

अब सवाल ये है कि आखिर डिप्टी सीएम के क्षेत्र में अगर जनता को न्याय के लिए दर-दर भटकना पड़े, तो फिर बाकी प्रदेश का क्या हाल होगा?

स्थानीय लोगों का कहना है कि तहसीलदार कार्यालय से ज्यादा नेताओं और मंत्रियों की “चमचागिरी मीटिंगों” में व्यस्त दिखाई देते हैं। जमीन विवाद, सीमांकन, नामांतरण जैसे जरूरी मामलों की फाइलें धूल खा रही हैं और जनता सिर्फ तारीख पर तारीख पा रही है।

विडंबना देखिए… जिस जनता ने अरुण साव को वोट देकर विधायक बनाया, मंत्री बनाया और फिर डिप्टी सीएम की कुर्सी तक पहुंचाया, आज वही जनता तहसील कार्यालय के बाहर घंटों धूप में बैठकर अधिकारी का इंतजार कर रही है। लेकिन साहब शायद दूसरे जिलों में राजनीति चमकाने और भाषण देने में इतने व्यस्त हैं कि अपने गढ़ की बदहाली देखने का समय ही नहीं बचा।

आरोप लग रहे हैं कि लोरमी में अब प्रशासन नहीं, “भगवान भरोसे व्यवस्था” चल रही है। पेशी वाले दिन लोग सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक बैठे रहते हैं, लेकिन अधिकारी महोदय कार्यालय पहुंचना जरूरी नहीं समझते। बाद में एक नई तारीख देकर जनता को फिर घर भेज दिया जाता है।

सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या डिप्टी सीएम के क्षेत्र में अधिकारियों का इतना बेखौफ होना बिना राजनीतिक संरक्षण के संभव है? अगर नहीं, तो फिर अरुण साव आखिर किस बात के जनप्रतिनिधि हैं? सिर्फ चुनाव के समय हाथ जोड़ने और बाद में जनता को लाइन में खड़ा छोड़ देने के लिए?

सरकार चाहे जितना “सुशासन” का ढोल पीट ले, लेकिन लोरमी तहसील की तस्वीर बता रही है कि जमीन पर प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह लापता है। और जब डिप्टी सीएम के अपने क्षेत्र में जनता की सुनवाई नहीं हो रही, तो बाकी प्रदेश की हालत का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

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