भोपाल। मध्य प्रदेश में कांग्रेस अब संगठन को मजबूत करने के साथ आने वाले चुनावों की तैयारी में भी जुटती नजर आ रही है। पार्टी इस बार टिकट वितरण के पुराने तरीके में बदलाव की तैयारी कर रही है। बताया जा रहा है कि अब टिकट किसी बड़े नेता की सिफारिश या करीबी होने के आधार पर नहीं, बल्कि जिला अध्यक्ष की राय, सर्वे रिपोर्ट और उम्मीदवार की जीत की संभावना को ध्यान में रखकर दिया जाएगा।
2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता में वापसी की उम्मीद थी, लेकिन नतीजे पार्टी के पक्ष में नहीं आए। इसके बाद लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस को मध्य प्रदेश की सभी 29 सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। हालांकि, अब पार्टी संगठन में बदलाव और नए चेहरों के साथ दोबारा सक्रिय होने की कोशिश कर रही है।
जीतू पटवारी और उमंग सिंघार की जोड़ी पर भरोसा
विधानसभा चुनाव के बाद राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश कांग्रेस में नई जिम्मेदारियां देते हुए जीतू पटवारी को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और उमंग सिंघार को नेता प्रतिपक्ष बनाया। इसके बाद पटवारी ने प्रदेशभर में दौरे कर संगठन को मजबूत करने पर जोर दिया, जबकि उमंग सिंघार विधानसभा के अंदर और बाहर सरकार के खिलाफ आक्रामक विपक्ष की भूमिका निभाते नजर आए।
इसी कड़ी में कांग्रेस ने संगठन सृजन अभियान के तहत बड़ी संख्या में नए जिला अध्यक्ष भी नियुक्त किए। दावा है कि इन नियुक्तियों में किसी बड़े नेता की पसंद के बजाय दूसरे राज्यों से आए पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट को आधार बनाया गया। इससे पार्टी के भीतर नए नेताओं और कार्यकर्ताओं को आगे आने का मौका मिला है।
जिला अध्यक्ष की राय होगी महत्वपूर्ण
नई व्यवस्था में जिला अध्यक्षों को संगठन के स्तर पर ज्यादा अधिकार दिए गए हैं। अब टिकट के दावेदारों को लेकर जिला अध्यक्षों की रिपोर्ट को भी महत्व दिया जाएगा। जिला अध्यक्ष अपने क्षेत्र में उम्मीदवार की पकड़, संगठन में सक्रियता, जनता के बीच छवि और चुनाव जीतने की क्षमता को लेकर अपनी रिपोर्ट देंगे।
राहुल गांधी की ओर से अलग से सर्वे भी कराया जाएगा। इसके बाद जिला अध्यक्ष की रिपोर्ट और सर्वे के नतीजों को मिलाकर उम्मीदवार के नाम पर फैसला किए जाने की बात कही जा रही है।
युवाओं को मिलेगा ज्यादा मौका
कांग्रेस इस बार टिकट वितरण में युवाओं को अधिक अवसर देने की रणनीति पर भी काम कर रही है। पार्टी के अंदर यह चर्चा है कि अधिक उम्र के नेताओं की जगह नए और सक्रिय चेहरों को आगे लाया जाए। दावेदारों की उम्र को लेकर भी एक सीमा तय किए जाने की बात सामने आ रही है।
15 हजार से ज्यादा वोट से हारने वालों पर संकट
2023 के विधानसभा चुनाव में 15 हजार से अधिक वोटों के अंतर से हारने वाले नेताओं को इस बार टिकट नहीं देने की रणनीति पर भी चर्चा है। हालांकि, अंतिम फैसला पार्टी की चुनावी रणनीति और सर्वे रिपोर्ट के आधार पर होगा।
इसके साथ ही उम्मीदवारों के पिछले चुनाव में प्रदर्शन और संगठन के प्रति उनकी भूमिका की भी समीक्षा की जा रही है।
सीबोटेज करने वालों पर भी नजर
कांग्रेस के भीतर लंबे समय से यह शिकायत रही है कि टिकट नहीं मिलने या किसी दूसरे उम्मीदवार को टिकट मिलने के बाद कुछ नेता पार्टी उम्मीदवार के खिलाफ काम करते हैं। इसी को लेकर इस बार नेताओं की निष्ठा और पिछले चुनाव में उनकी भूमिका की गोपनीय रिपोर्ट तैयार किए जाने की बात कही जा रही है।
जिला अध्यक्ष अपने-अपने जिले से ऐसे नेताओं के बारे में भी रिपोर्ट दे सकते हैं, जिन पर पार्टी विरोधी गतिविधियों या सीबोटेज के आरोप लगे हैं।
बड़े नेताओं की परिक्रमा नहीं, सर्वे से मिलेगा टिकट?
कांग्रेस की नई रणनीति का सबसे बड़ा संदेश यही माना जा रहा है कि टिकट वितरण में अब सिर्फ बड़े नेताओं की सिफारिश पर्याप्त नहीं होगी। जमीनी पकड़, सर्वे, संगठन में सक्रियता, पिछले चुनाव का प्रदर्शन और जीतने की क्षमता को ज्यादा महत्व देने की तैयारी है।
अगर यह फॉर्मूला लागू होता है तो मध्य प्रदेश कांग्रेस में आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले कई पुराने समीकरण बदल सकते हैं और नए चेहरों के लिए रास्ता खुल सकता है।







