अडानी के मुनाफे के लिए छत्तीसगढ़ को रेगिस्तान बनाने की तैयारी हो चुकी है। भीषण गर्मी से झुलसते हुए पूरे प्रदेश को सरकार ने उपहार के रूप में हसदेव के 7 लाख पेड़ो को काटने की मंजूरी दे दी है।
अडानी के MDO से जुड़े केंते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक को केंद्रीय वन मंत्रालय की वन सलाहकार समिति ने हरी झंडी दे दी है। यानी सात लाख पेड़ों की बारी आ गई सरकार का नया वृक्षारोपण प्रोग्राम: “पेड़ हटाओ, लाभ बढ़ाओ”।
पहले से ही परसा और PEKB खदानों ने हसदेव के करीब 10,630 एकड़ जंगल को चट कर लिया है और लगभग 6 लाख पेड़ काटे जा चुके है। अब बाकी पेड़ भी खत्म करने की ठान ली गई है। भारतीय वन्य जीव संस्थान ने चेतावनी दी थी कि इससे हसदेव नदी और बांगो जलाशय प्रभावित होंगे, सिंचाई जमीनों पर गंभीर असर होगा।



स्थानीय आदिवासी बताते हैं कि यह परियोजना घने जंगलों में है वहां के लोगों की लगभग 70% आमदनी जंगल पर टिकी है। अब उनकी रोटी-रोटी का क्या? और रामगढ़ पहाड़ जैसे पवित्र और ऐतिहासिक स्थान की दूरी के साथ भी खेल हुआ: जहां 9 किमी है, वहां 11 किमी कर दिया गया तार्किक गणित नहीं, तो क्या? मतलब नियमों को मोड़कर मंजूरी देनी है तो दे दो, बस अडानी जैसे बड़े लोग खुश रहें।
हाथियों के लिए बनाए गए रास्ते भी अब “डायवर्ट” करने का प्लान है। लेमरू हाथी रिजर्व के प्रवास मार्गों पर खनन से रोक लगेगी और मानव-हाथी झड़प बढ़ेगी। यानी प्रकृति, जानवर और आदिवासी सबको बॉन्ड-ऑफर में बंद कर दिया गया है, बस कॉर्पोरेट का फायदा सुरक्षित रहे।
सरकार और मंत्रालय से सवाल साफ हैं: क्या जनता की जमीन और पेड़ अडानी के मुनाफे के लिए बेची जा सकती है? अगर पर्यावरण संरक्षण करना है तो ऐसे फैसले रद्द हों, और अगर मुनाफा ही सब कुछ है तो कम-से-कम नाम बदलकर कह दें “नेशनल कोल-टू-ट्रस्ट अडानी”।





