छत्तीसगढ़ सहित देशभर में आयोजित विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की कार्यप्रणाली अब गंभीर सवालों के घेरे में है। अभ्यर्थियों की योग्यता परखने के नाम पर अपनाए जा रहे सख्त नियम अब विवाद का कारण बनते जा रहे हैं। परीक्षा केंद्रों पर कान की बाली उतरवाना, जूते-मोजे निकलवाना और यहां तक कि कपड़ों की आस्तीन तक कटवाने जैसी घटनाएं सामने आ रही हैं, जिससे युवाओं में आक्रोश बढ़ता जा रहा है।
अभ्यर्थियों का कहना है कि यह प्रक्रिया अब परीक्षा से ज्यादा अपमानजनक अनुभव बनती जा रही है। सवाल उठता है कि क्या नकल रोकने के नाम पर उम्मीदवारों की गरिमा से समझौता करना जरूरी है? क्या आधुनिक तकनीक और बेहतर प्रबंधन के जरिए पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं की जा सकती?
वहीं दूसरी ओर, पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ियों जैसे गंभीर मुद्दों पर एजेंसियों की चुप्पी भी संदेह पैदा करती है। सख्ती सिर्फ अभ्यर्थियों पर, लेकिन सिस्टम की खामियों पर नरमी—यह दोहरा रवैया आखिर कब तक चलेगा?
युवा वर्ग अब जवाब मांग रहा है। उनका कहना है कि मेहनत के साथ अपमान सहना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है। समय आ गया है कि परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही तय हो और ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिसमें सुरक्षा के साथ-साथ अभ्यर्थियों के सम्मान का भी पूरा ख्याल रखा जाए।



