विकास के पोस्टर, पिछड़ेपन की हकीकत: BJP से जवाब तलब

Madhya Bharat Desk
2 Min Read

देश आज विकास की नहीं, बल्कि “पिछड़ा घोषित होने की दौड़” में खड़ा दिखाई देता है। सरकारें आत्मनिर्भर भारत और सशक्त समाज की बातें करती हैं, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि हर तरफ़ एक ही मांग गूंज रही है—हमें भी सूची में जोड़ो। वजह साफ़ है: सिस्टम ऐसा बना दिया गया है जहाँ आगे बढ़ने से ज़्यादा फ़ायदा पिछड़ा कहलाने में दिखता है।

आंकड़े इस विफल नीति की गवाही देते हैं। 1950 में अनुसूचित जाति (SC) की सूची में केवल 607 जातियाँ थीं, जो आज बढ़कर लगभग 1200 हो चुकी हैं। जब संविधान ने अस्पृश्यता पर रोक लगा दी, तो फिर ये अतिरिक्त 600 से अधिक जातियाँ आई कहाँ से? यही हाल अनुसूचित जनजाति (ST) का है—241 से बढ़कर 744, और OBC की सूची जो कभी करीब 3000 से शुरू हुई थी, आज 5000 से अधिक तक पहुँच चुकी है। अगर समाज सच में आगे बढ़ रहा है, तो सूचियाँ घटनी चाहिए थीं, बढ़ नहीं।

यह किसी वर्ग के अधिकारों पर हमला नहीं, बल्कि सरकार की नीयत और नीति पर सवाल है। जिस व्यवस्था का उद्देश्य अस्थायी सहारा देकर समाज को मुख्यधारा में लाना था, वही अब स्थायी पहचान और वोट बैंक की राजनीति का औज़ार बन चुकी है।

सरकार बताए—कब समीक्षा होगी, कब तय होगा कि कौन आगे बढ़ चुका है और किसे अब भी मदद चाहिए? क्योंकि जो देश अपने नागरिकों को हमेशा पिछड़ा बनाए रखता है, वह खुद कभी आगे नहीं बढ़ सकता।

Share on WhatsApp

Share This Article
Leave a Comment