पाथरडीह घाट — रायपुर नगर सीमा से करीब 13 किलोमीटर दूर, रायपुर और बेमेतरा जिलों की सीमा पर बहने वाली खारून नदी अब मायूस कर रही है। स्थानीय किसान और ग्रामीण बताते हैं कि नदी का बहाव पाथरडीह घाट के पास इतना कम हो गया है कि पानी रायपुर की सीमा से आगे नहीं पहुँच पाता। सिंचाई के लिए किसी समय जीवनरेखा रही यह नदी अब प्रदूषण और अवरुद्ध बहाव का शिकार हो चुकी है, जिसके सिरे सीधे किसानों की फसलों, पानी और स्वास्थ्य पर पहुँच रहे हैं।
असरित क्षेत्र और संख्या
स्थानीय प्रशासनिक रेकॉर्ड और ग्रामीणों के अनुमान के मुताबिक खारून नदी और उसकी सहायक धाराओं के किनारे लगभग 170–230 गाँव बिखरे हुए हैं। इनमें से बेमेतरा जिले के बेरला ब्लॉक के करीब 55 और रायपुर जिले के लगभग 80 गाँव विशेष रूप से अपनी आजीविका के लिए नदी पर निर्भर हैं। कंदराका, ढाबा, कुम्ही, देवसरा, खड़मुड़ी , मुडापार और मूरा,लखाना जैसे गाँवों के किसानों ने पानी के सूखने और प्रदूषण से होने वाले प्रभावों की गहरी चिंता जाहिर की है।
स्वास्थ्य पर प्रभाव
गाँवों में पानी से होने वाली बीमारियाँ सामान्य होती जा रही हैं। स्थानीय स्वास्थ्यकर्मियों और ग्रामीणों के मुताबिक डायरिया, टायफाइड, पीलिया और त्वचा संबंधी संक्रमण लगातार बढ़ रहे हैं। कई बार एक साथ कई गाँवों में महामारी जैसी स्थिति बन चुकी है, बच्चों और बुज़ुर्गों पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है। पीने और घरेलू उपयोग के लिए स्वच्छ पानी न मिलना सार्वजनिक स्वास्थ्य के साथ-साथ शैक्षिक व आर्थिक गतिविधियों को भी प्रभावित कर रहा है।

किसानों के आरोप और औद्योगिक भूमिका
स्थानीय किसानों का आरोप है कि सिलतरा और मेटल पार्क इंडस्ट्रियल एरिया के कुछ उद्योग साफ़ पानी अवैध रूप से ले जाते हैं और प्रभावित क्षेत्रों की तरफ़ गंदा पानी छोड़ देते हैं। इससे नदी के प्राकृतिक बहाव में बाधा आती है और पानी विषैली बन जाता है। किसान कहते हैं कि उद्योगों की निचली कनेक्शन और अवैध ड्रेनेज से नदी के पानी की गुणवत्ता तेज़ी से गिर रही है, जबकि उद्योगों की निगरानी और दंडात्मक कार्रवाई न के बराबर दिखाई देती है।
प्रशासन की लापरवाही और CSR की अनदेखी
गाँवों के आरोप यही हैं कि शिकायतों के बावजूद प्रशासनिक कार्रवाई सीमित और देर से होती है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (PCB) और स्थानीय प्रशासन के औचक निरीक्षण या प्रभावी नीतिगत हस्तक्षेप का अभाव स्पष्ट है। साथ ही स्थानीय लोगों का आरोप है कि कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फंड गाँवों तक नहीं पहुँचते, या जो मदद मिलती भी है वह टिकाऊ समाधान नहीं देती।
आर्थिक और सामाजिक परिणाम
खारून पर निर्भर किसान अब सिंचाई के लिए वैकल्पिक स्रोत खोजने को मजबूर हैं; कई खेत सूख गए या फसलें बर्बाद हुईं। यह सीधे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है—आय के घटने, कर्ज बढ़ने और पलायन के रूप में। स्वच्छ पानी न मिलने से महिलाओं और बच्चों पर कार्यभार बढ़ता है; स्कूलों में उपस्थिति घटती है और समय के साथ सामाजिक-आर्थिक असंतुलन गहरा सकता है।

तत्काल और दीर्घकालिक कदम (माँगे)
स्थानीय समुदाय और सामाजिक कार्यकर्ता कुछ तत्काल और दीर्घकालिक कदमों की माँग कर रहे हैं:
फोरेंसिक जल‑परिक्षण कराकर प्रदूषण के स्रोत की पहचान और सार्वजनिक रिपोर्ट जारी करना।
प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई, आवश्यक होने पर शटडाउन और जुर्माना।
प्रभावित गाँवों को तत्काल स्वच्छ पीने का पानी (टैंकर, फिल्टर यूनिट) और प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराना। नदी के बहाव पुनर्स्थापित करने के लिए नदियों की सफाई, घाटों का पुनर्निर्माण और नदीनालों की नियमित मॉनिटरिंग। CSR फंडों की पारदर्शी जांच और वास्तविक परियोजनाओं में उनका इस्तेमाल सुनिश्चित करना।जल और सार्वजनिक स्वास्थ्य को लेकर एक स्वतंत्र निगरानी पैनल का गठन जिसमें ग्रामीण प्रतिनिधि, जलविज्ञानी और प्रशासनिक अधिकारी शामिल हों।
निहितार्थ
खारून की हालत सिर्फ़ पर्यावरणीय संकट नहीं है; यह जीवन के मौलिक अधिकार—स्वास्थ्य, जल और आजीविका—का सवाल है। यदि तुरंत और ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो न केवल सैकड़ों गाँवों की अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी बल्कि यहाँ के लोग दीर्घकालिक स्वास्थ्य जोखिमों और सामाजिक अस्थिरता का सामना करेंगे। शासन के लिए यह परीक्षण का समय है—क्या वह पानी की सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देगा या गाँवों की ‘धीमी मृत्यु’ जारी रहेगी?
— नागेंद्र पांडेय (MBP), संपादक





