रायपुर। अब केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी को इस मामले पर सामने आकर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। देश में ई-20 (20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित) पेट्रोल को बढ़ावा देने की नीति के सबसे बड़े समर्थकों में वे स्वयं रहे हैं। सरकार का उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाना, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना और प्रदूषण घटाना है, लेकिन यदि इस नीति के कारण किसी आम उपभोक्ता को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है, तो उसके प्रति जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि रायपुर जिला उपभोक्ता आयोग ने एक अहम फैसले में माना कि संबंधित कार का इंजन ई-20 पेट्रोल के अनुकूल नहीं था, जिसके कारण वाहन बार-बार खराब हुआ। आयोग ने वाहन निर्माता और डीलर को 45 दिनों के भीतर ई-20 समर्थित नई कार देने या 20.50 लाख रुपये लौटाने का आदेश दिया है। इसके अलावा उपभोक्ता को मानसिक पीड़ा के लिए एक लाख रुपये और वाद व्यय के रूप में 10 हजार रुपये देने के भी निर्देश दिए गए हैं।
यदि यह वास्तव में देश में ई-20 पेट्रोल से जुड़े शुरुआती प्रमाणित मामलों में से एक है, तो यह केवल एक उपभोक्ता का मामला नहीं, बल्कि उन लाखों वाहन मालिकों से जुड़ा सवाल है जो सरकार की नीति के अनुरूप ई-20 पेट्रोल का उपयोग कर रहे हैं।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या नितिन गडकरी इस फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया देंगे? यदि किसी वाहन में ई-20 पेट्रोल के कारण तकनीकी समस्या आती है, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी—सरकार, वाहन निर्माता, तेल कंपनियों की या फिर उपभोक्ता की? और क्या इस फैसले का भी खंडन किया जाएगा, या इसे नीति के क्रियान्वयन से जुड़े एक गंभीर संकेत के रूप में देखा जाएगा?
हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि यह रायपुर जिला उपभोक्ता आयोग का फैसला है। यदि संबंधित पक्ष इसके खिलाफ अपील करता है, तो अंतिम कानूनी स्थिति उच्च उपभोक्ता आयोग या सक्षम न्यायिक मंच के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगी।





