RSS की ‘समरसता’ बनाम चुनावी जाति कार्ड: भागवत के आदर्श और सत्ता की सियासत में टकराव

Madhya Bharat Desk
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत जब मंच से ‘समरसता’ और ‘जातिविहीन समाज’ की बात करते हैं, तो वह सुनने में एक सुंदर और आदर्श कल्पना लगती है। लेकिन जैसे ही यह विचार ज़मीनी राजनीति से टकराता है, इसकी चमक फीकी पड़ने लगती है।

सबसे बड़ा विरोधाभास तब सामने आता है, जब संघ के ही एक समय के प्रचारक रहे देश के प्रधानमंत्री चुनावी मंचों से खुद को ‘पिछड़ी जाति’ का प्रतिनिधि बताकर मतदाताओं से समर्थन मांगते हैं। यही सवाल खड़ा करता है—क्या समरसता वास्तव में संघ की नीति है या सिर्फ एक भाषणात्मक नारा?

प्रचारक से पिछड़ी जाति तक: सवालों के घेरे में समरसता

राजनीतिक गलियारों में यह बहस तेज़ है कि यदि संघ का मूल दर्शन जाति से ऊपर उठने का है, तो फिर सत्ता की लड़ाई में जाति ही सबसे मजबूत हथियार क्यों बन जाती है?

संघ की शिक्षा कहती है—“हम सब पहले हिंदू हैं”, लेकिन चुनाव आते ही यह पहचान सिमटकर ‘पिछड़ा’, ‘दलित’ और ‘सवर्ण’ में बदल जाती है। जानकारों का कहना है कि जब देश का सबसे प्रभावशाली नेता अपनी सामाजिक पहचान को राजनीतिक ढाल बनाता है, तो संघ प्रमुख के ‘समरस समाज’ के दावे खोखले प्रतीत होते हैं।

यह संकेत देता है कि जाति खत्म नहीं हुई है, बल्कि उसे एक नए सांचे में ढालकर चुनावी गणित का हिस्सा बना लिया गया है।

सांस्कृतिक संगठन या राजनीतिक रणनीतिकार?

संघ खुद को एक सांस्कृतिक संगठन बताता रहा है, लेकिन उसकी वैचारिक और सांगठनिक मौजूदगी सत्ता के केंद्रों तक साफ़ दिखाई देती है।

एक ओर समाज को जोड़ने का नैतिक और आध्यात्मिक संदेश, तो दूसरी ओर चुनाव जीतने के लिए जाति आधारित रणनीति—यही वह दोहरी राजनीति है, जिस पर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है। कांग्रेस और कई क्षेत्रीय दलों का आरोप है कि संघ ने जाति उन्मूलन की जगह उसे ‘वोट बैंक मैनेजमेंट’ में बदल दिया है।

बहुजन राजनीति की फिर से आहट

जातिगत पहचान को लेकर चल रही इस राजनीति का असर अब साफ दिखने लगा है। दलित और पिछड़ा वर्ग, जो खुद को ‘समरसता’ के नारे में हाशिये पर महसूस कर रहे थे, अब खुलकर सत्ता में हिस्सेदारी की मांग कर रहे हैं।

यही वजह है कि मायावती की बहुजन राजनीति की गूंज एक बार फिर उन इलाकों में सुनाई देने लगी है, जहां भाजपा और संघ की पकड़ कभी सबसे मजबूत मानी जाती थी। ‘हिंदू एकता’ का नारा अब पर्याप्त नहीं रह गया—अब सवाल प्रतिनिधित्व का है।

“समरसता की असल परीक्षा तब होती है, जब सत्ता के शिखर पर बैठा व्यक्ति अपनी उपलब्धियों से ज़्यादा अपनी जाति को अपनी पहचान बना ले।”

बड़ा सवाल

क्या मोहन भागवत इस जातिगत चुनावी प्रचार से अनजान हैं?

या फिर यह संघ की सोची-समझी रणनीति है—जहां शीर्ष नेतृत्व समरसता की बात करे और राजनीतिक मोर्चे पर जाति के सहारे सत्ता साधी जाए?

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