धान खरीदी के मौजूदा हालात ने सरकार और प्रशासन के तमाम दावों की पोल खोल दी है। यह अब किसी बैंक शाखा की तकनीकी समस्या या अस्थायी नकदी संकट नहीं रहा, बल्किपूरी व्यवस्था के किसान-विरोधी चरित्र का सबूत बन चुका है। जिस किसान ने खेत में पसीना बहाया, वही आज अपनी ही मेहनत की कमाई के लिए बैंक के बाहर लाइन में खड़ा है और सत्ता मूकदर्शक बनी हुई है।
सरकार को यह पहले से पता था कि धान खरीदी के दौरान रोज़ करोड़ों रुपये नकद की जरूरत पड़ेगी। भुगतान का अनुमान, खरीदी की मात्रा और समय-सारिणी सब तय थी। इसके बावजूद अगर किसान को 20-20 हजार रुपये के लिए अपमानित किया जा रहा है, तो यह सीधी प्रशासनिक विफलता है। और उससे भी ज्यादा गंभीर यह तथ्य है कि इसी सिस्टम में बिचौलियों और कोचियों को 49 हजार रुपये तक की रकम आसानी से मिल रही है। यह फर्क अपने आप में सरकार पर आरोप है।
मुख्यमंत्री से लेकर संबंधित मंत्री और जिले के कलेक्टर तक, कोई भी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। अगर समीक्षा बैठकों में सब ठीक बताया जा रहा था, तो ज़मीनी सच्चाई इतनी भयावह क्यों है? और अगर सच्चाई मालूम थी, तो सुधार क्यों नहीं हुआ? बुज़ुर्ग किसान ठंड में घंटों लाइन में खड़े हैं, कैश 10:30 बजे खत्म हो रहा है और प्रशासन खामोश है—यह संवेदनहीनता नहीं तो और क्या है।
डिजिटल भुगतान और किसान सम्मान की बातें अब खोखली प्रतीत होती हैं। गांव की हकीकत यह है कि खेती आज भी नकद पर चलती है। नकदी रोकना किसान को मजबूर करना है—दलाल के पास जाने के लिए, उधार लेने के लिए, या समझौता करने के लिए। यह स्थिति संयोग नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था का नतीजा है जिसमें किसान सबसे आख़िरी प्राथमिकता है।
अगर अब भी सरकार और प्रशासन ने जवाबदेही तय नहीं की, तो यह साफ हो जाएगा कि किसान सिर्फ भाषणों में अहम है, हकीकत में नहीं। और जब किसान यह समझ लेगा, तो सवाल सिर्फ बैंक की लाइन का नहीं रहेगा—वह सत्ता की साख का सवाल बन जाएगा।







