“सिर्फ कनेक्शन नहीं, नल से पानी आना चाहिए” — प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह सख्त चेतावनी जल जीवन मिशन को लेकर अब राजनीतिक भूचाल का कारण बनती दिख रही है। केंद्र सरकार जहां इस योजना में भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की बात कर रही है, वहीं छत्तीसगढ़ में हुई प्रशासनिक कार्रवाई को विपक्ष ने महज दिखावा और लीपापोती करार दिया है।
छत्तीसगढ़ में बहुप्रचारित जल जीवन मिशन के तहत सामने आई गंभीर अनियमितताओं के बाद लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (PHE) विभाग में कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के निलंबन और बड़े पैमाने पर तबादले किए गए हैं। शासन का दावा है कि यह कार्रवाई भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे ‘असल दोषियों को बचाने की रणनीति’ बताया जा रहा है।
आरोप है कि जिन अधिकारियों और ठेकेदारों ने करोड़ों रुपये के कार्यों में गुणवत्ता से समझौता किया, पाइपलाइन बिछाने में घोटाले किए और कागजों में पानी पहुंचा दिया, उन पर हाथ डालने से सरकार बच रही है। इसके बजाय चुनिंदा अधिकारियों पर कार्रवाई कर पूरे घोटाले को ढकने की कोशिश की जा रही है।
प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में जल जीवन मिशन की समीक्षा बैठक में स्पष्ट कहा था कि सिर्फ नल लगवा देना पर्याप्त नहीं है, जब तक हर गांव और हर घर में पाइप के जरिए नियमित पानी न पहुंचे। पीएम ने यह भी निर्देश दिया था कि शिकायतों का निपटारा जमीन पर जाकर हो और गड़बड़ी करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के बिना आगे का फंड न दिया जाए।
देशभर में हुई जांच में यह खुलासा हुआ था कि कई राज्यों में कनेक्शन तो दे दिए गए, लेकिन 14 से 16 फीसदी इलाकों में पानी नियमित नहीं पहुंच रहा। कहीं घटिया पाइप लगाए गए तो कहीं रखरखाव की कोई व्यवस्था नहीं थी। इसी के बाद CBI, ED, ACB और लोकायुक्त जैसी एजेंसियां जांच में जुटीं और सैकड़ों अधिकारियों व ठेकेदारों पर कार्रवाई हुई।
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लेकिन छत्तीसगढ़ में हुई ताजा कार्रवाई को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह कार्रवाई वास्तव में भ्रष्टाचार पर चोट है या फिर प्रधानमंत्री की सख्ती के दबाव में की गई औपचारिक कवायद? विपक्ष का आरोप है कि निलंबन और तबादले कर सरकार असली घोटालेबाजों को बचा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर जल जीवन मिशन में हुई गड़बड़ियों की निष्पक्ष और गहराई से जांच नहीं हुई, तो यह मुद्दा आने वाले समय में प्रदेश की राजनीति में बड़ी जंग का रूप ले सकता है।







