रायपुर।छत्तीसगढ़ में बहुप्रचारित जल जीवन मिशन में सामने आई अनियमितताओं के बाद लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (PHE) विभाग में प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई की गई है। शासन द्वारा जारी आदेशों के तहत कुछ वरिष्ठ अधिकारियों को निलंबित किया गया है और कई अधिकारियों के तबादले भी किए गए हैं।
हालांकि, इन फैसलों को लेकर अब कार्रवाई की मंशा और निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि प्रदेशभर में जल जीवन मिशन के तहत हुए कथित भ्रष्टाचार और नियमों की अनदेखी के मामलों में असल जिम्मेदारों को बचाया जा रहा है, जबकि प्रतीकात्मक कार्रवाई कर मामला ठंडा करने की कोशिश की जा रही है।
शासन के आदेशों में जल जीवन मिशन के कार्यों में लापरवाही, सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना सामग्री में बदलाव और विभागीय निर्देशों की अनदेखी जैसे आरोपों का उल्लेख है। इन्हीं आधारों पर कुछ अधिकारियों को निलंबित किया गया है और निलंबन अवधि के दौरान उनके मुख्यालय भी तय किए गए हैं।
सवालों के घेरे में मंत्री की भूमिका
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि जल जीवन मिशन में अनियमितताएं एक-दो अधिकारियों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है। इसके बावजूद उपमुख्यमंत्री एवं लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के मंत्री अरुण साव ने अपने करीबी और प्रभावशाली जगदलपुर के भाजपा नेता जिसका प्रभाव अब भी जल जीवन मिशन में है उसको अब भी महत्वपूर्ण पद पर बनाए रखा है। इससे यह सवाल और गहरा हो गया है कि क्या कार्रवाई वास्तव में भ्रष्टाचार के खिलाफ है या फिर सिर्फ सार्वजनिक दबाव और छवि सुधार का प्रयास।


छवि बचाने की कवायद?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल जीवन मिशन में हुई अनियमितताओं की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच नहीं होती, तो सरकार की “जीरो टॉलरेंस” नीति सिर्फ कागज़ों तक सीमित रह जाएगी।
सवाल यह भी है कि—
क्या सभी स्तरों पर जिम्मेदारी तय की जाएगी? क्या राजनीतिक संरक्षण पाने वाले अधिकारियों पर भी समान कार्रवाई होगी? या फिर मामला कुछ निलंबनों और तबादलों तक सीमित रह जाएगा?
जनता के लिए जीवनरेखा मानी जाने वाली इस योजना में यदि भ्रष्टाचार साबित होता है, तो यह सरकारी जवाबदेही और पारदर्शिता पर बड़ा सवाल होगा।










