जयपुर/रायपुर। देशभर में बीते कुछ दिनों से हिन्दू समाज का आक्रोश सड़कों पर साफ दिखाई दे रहा है। इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया पर लगातार आ रही रिपोर्ट्स के अनुसार, राजस्थान सहित कई राज्यों के शहरों-कस्बों में हजारों की संख्या में लोग तिरंगा यात्रा और शांति मार्च निकालकर अपनी नाराजगी जता रहे हैं। खास बात यह रही कि राजस्थान में नेट-बंदी के बावजूद प्रदेश के अधिकांश शहरों में बाजार पूरी तरह बंद रहे और गलियों के छोटे-छोटे दुकानदार भी इस बंद में शामिल हुए।
जेहादी मानसिकता के खिलाफ गुस्सा
हिन्दू संगठनों का कहना है कि यह गुस्सा जेहादी मानसिकता के विरुद्ध है। कई जगहों पर लोगों ने आरोप लगाया कि उनके आराध्यों की शोभायात्राओं पर लगातार पाबंदियां लगाई जाती हैं और पत्थरबाजी की घटनाएं होती हैं। वहीं प्रशासनिक आदेशों में कहा जाता है कि शोभायात्रा मस्जिद या मुस्लिम बहुल इलाकों से नहीं निकलेगी, जिससे समाज में असंतोष गहराता जा रहा है।
“स्वतंत्रता के बाद भी क्यों बंधन?”
कई लोगों का कहना है कि अखण्ड भारत की आज़ादी के लिए बलिदान देने के बाद 1947 में विभाजन सहने के बावजूद हिन्दू समाज को आज भी पूर्ण स्वतंत्रता का अनुभव नहीं हो पा रहा है। उनका आरोप है कि जहाँ ईसाई और मुस्लिम समुदाय अपने संस्थानों में बाइबिल और कुरान पढ़ा सकते हैं, वहीं हिन्दू समाज को गीता, रामायण, महाभारत और उपनिषदों की शिक्षा देने की अनुमति नहीं है।
सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब
प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से मिल रही तस्वीरों और वीडियो में देखा जा सकता है कि शांति मार्च और तिरंगा यात्रा में महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों की भारी भागीदारी रही। जगह-जगह लोग “भारत माता की जय” और “वंदे मातरम्” के नारे लगाते दिखे।
हिन्दू समाज का यह आंदोलन अचानक भले ही दिखाई दे रहा हो, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यह दशकों से भीतर पनप रही कुंठा और असंतोष का परिणाम है। लोग प्रशासन और सरकार से सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर आज़ादी के 75 साल बाद भी उन्हें बराबरी का हक और सम्मान क्यों नहीं मिल पा रहा है।



