भारत विविधता में एकता का प्रतीक है और यहां हर पर्व अपनी खास परंपराओं के साथ मनाया जाता है। इन्हीं में से एक है छत्तीसगढ़ का विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा, जिसकी शुरुआत इस वर्ष 24 जुलाई को हरेली अमावस्या से हुई है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है, बल्कि सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण भी है।
मुख्य विवरण:
बस्तर दशहरा की शुरुआत दंतेश्वरी मंदिर के सामने ‘पाट जत्रा’ की रस्म से होती है। यह परंपरा दशहरा के 75 दिनों तक चलने वाले अनुष्ठानों की शुरुआत का प्रतीक होती है। इस पर्व में जगदलपुर की जनता बड़े उत्साह के साथ भाग लेती है।
इस दशहरे की सबसे खास बात यह है कि यह रावण दहन के बिना मनाया जाता है। इसके स्थान पर रथ की परिक्रमा की जाती है। बस्तर दशहरा की यह परंपरा लगभग 618 वर्षों से चली आ रही है।
इस पर्व में कई विशेष विधानों का पालन होता है, जैसे कांटों के झूले पर झूलकर काछनदेवी से अनुमति लेना, रथ परिक्रमा, मुरिया दरबार और देवी विदाई। ये सभी अनुष्ठान बस्तर की आदिवासी परंपराओं और देवी भक्ति को दर्शाते हैं।
महत्व और विशेषता:
बस्तर दशहरा की लंबी अवधि और अद्वितीय परंपराएं इसे देश-विदेश में अलग पहचान दिलाती हैं। यह न केवल धार्मिक भावनाओं से जुड़ा है, बल्कि जनजातीय संस्कृति, शौर्य, त्याग और समुदाय की एकता का प्रतीक भी है।



