यह पूरा मामला केवल UGC की गाइडलाइन या विश्वविद्यालय परिसरों तक सीमित नहीं है, बल्कि अब यह सीधे-सीधे देश की एकता, सामाजिक समरसता और संविधान की आत्मा से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन चुका है।
प्रधानमंत्री जिस औपनिवेशिक सोच से मुक्ति की बात करते हैं, उसी सरकार के भीतर आज ऐसे लोग प्रभावशाली स्थानों पर बैठे दिखाई देते हैं जिनकी नीतियाँ देश को नए किस्म के वैचारिक और जातिगत विभाजन की ओर धकेल रही हैं। जनता का सवाल बिल्कुल साफ है—अगर सच में औपनिवेशिक और विभाजनकारी मानसिकता से मुक्ति चाहिए, तो फिर सरकार के भीतर और उसकी संस्थाओं में बैठे ऐसे तत्वों को बाहर करने की पहल क्यों नहीं की जाती?
UGC की नई गाइडलाइन को महज़ “यूनिवर्सिटी कैंपस का आंतरिक मामला” बताकर हल्के में लेना एक सोची-समझी रणनीति लगती है। विश्वविद्यालय देश का भविष्य गढ़ते हैं, यहीं से विचार निकलकर समाज और राजनीति को दिशा देते हैं। अगर इन्हीं परिसरों में वैचारिक ज़हर, पहचान की राजनीति और जातिगत उकसावे को संस्थागत रूप दिया जाएगा, तो इसका असर केवल छात्रों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश पर पड़ेगा। यह किसी सवर्ण या असवर्ण के पक्ष या विरोध की लड़ाई नहीं है, बल्कि उस खतरे के खिलाफ़ संघर्ष है जो पूरे राष्ट्र को कमजोर करता है। जो काम अंग्रेज़ भारत को तोड़ने के लिए नहीं कर सके, वही आज़ाद भारत में नीतियों के ज़रिये होता दिखाई दे रहा है और यह प्रक्रिया लगातार चल रही है।
सूत्रों के अनुसार इस नीति और नियम निर्माण से जुड़ी समिति में कपिल सिब्बल, रविशंकर प्रसाद, बांसुरी स्वराज जैसे बड़े नामों सहित कुल 16 सदस्य थे। साथ ही दिग्विजय सिंह का नाम भी चर्चा में लिया जा रहा है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर समिति में सरकार समर्थक सदस्यों का स्पष्ट बहुमत था, तो फिर किसी एक नेता की कथित “चाल” कैसे चल सकती है? और मान भी लें कि समिति ने कोई सिफारिश की, तो उसे लागू करने और अधिसूचित करने का अधिकार किसके पास था? इसका सीधा जवाब है—केंद्र सरकार और शिक्षा मंत्रालय।

सरकार बार-बार यह कहकर बचने की कोशिश कर रही है कि यह तो UGC का मामला है, जबकि हकीकत यह है कि पिछले करीब दो वर्षों से UGC का नियमित चेयरमैन तक नियुक्त नहीं है। ऐसे में नीतिगत फैसले कौन ले रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है। शिक्षा मंत्रालय ही UGC को चला रहा है, तो ज़िम्मेदारी से भागने का बहाना कैसे स्वीकार किया जा सकता है?
सुप्रीम कोर्ट के नाम पर भी जानबूझकर भ्रम फैलाया जा रहा है। अदालत ने कभी यह नहीं कहा कि नए नियम बनाकर विश्वविद्यालय परिसरों में जातिगत पहचान को और गहराया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ़ यह निर्देश दिया था कि भेदभाव से जुड़े मामलों की जानकारी दी जाए और 2012 से मौजूद नियमों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए। अदालत ने यह नहीं कहा था कि कैंपस को वैचारिक युद्धभूमि बना दिया जाए या जातिवाद को खत्म करने के नाम पर उसे और मज़बूत कर दिया जाए।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने तो संविधान और देश को बचाने का काम किया है, जबकि सरकार अपने स्तर पर इन विवादित नियमों को वापस लेने से अब तक बचती रही है।
आज देश यह जानना चाहता है कि क्या ऐसे काले और विभाजनकारी नियमों को लाने में जिन लोगों की भूमिका रही है, उन पर कोई कार्रवाई होगी? क्या भविष्य में इस तरह की नीतियाँ बनाने से पहले जिम्मेदार लोगों में जवाबदेही और डर पैदा किया जाएगा, ताकि कोई दूसरा फिर से देश को तोड़ने वाले विचारों के साथ आगे न आए? या फिर हर बार राष्ट्रहित के सवाल पर राजनीतिक सुविधा के हिसाब से चुप्पी साध ली जाएगी?
अगर सरकार ने अब भी आत्ममंथन नहीं किया, अगर ज़िम्मेदार चेहरों पर कार्रवाई नहीं हुई और अगर ऐसे नियम वापस नहीं लिए गए, तो यह मानना पड़ेगा कि देश को जोड़ने की नहीं, बल्कि बाँटने की राजनीति को ही संरक्षण दिया जा रहा है। और यही सबसे बड़ा खतरा है—केवल विश्वविद्यालयों के लिए नहीं, बल्कि पूरे भारत के लिए।







