कवर्धा। छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले में सरकारी धान संग्रहण केंद्रों से भारी मात्रा में धान गायब होने का मामला अब गंभीर प्रशासनिक और आर्थिक घोटाले के रूप में सामने आ रहा है। विभाग द्वारा इसे चूहे और दीमक से हुआ प्राकृतिक नुकसान बताने की कोशिश की जा रही है, लेकिन जांच में सामने आए तथ्य इस दलील को कमजोर करते नजर आ रहे हैं। सवाल यह उठ रहा है कि अगर नुकसान प्राकृतिक कारणों से हुआ, तो फिर दस्तावेजों में हेराफेरी और निगरानी के लिए लगाए गए CCTV कैमरों से छेड़छाड़ क्यों की गई।
प्रारंभिक जांच में स्पष्ट हुआ है कि मामला केवल धान की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित फर्जीवाड़े की पूरी श्रृंखला इसमें शामिल है। रिकॉर्ड में धान की ऐसी आवक-जावक दर्ज की गई है, जो वास्तव में कभी संग्रहण केंद्र तक पहुंची ही नहीं। खराब या डैमेज धान की खरीदी दिखाकर फर्जी बिल तैयार किए गए और इसके जरिए सरकारी खजाने से राशि निकाली गई। इतना ही नहीं, मजदूरों की फर्जी हाजिरी लगाकर भुगतान उठाने के प्रमाण भी सामने आए हैं। जब अनियमितताओं की भनक लगी, तो सच्चाई छिपाने के लिए CCTV कैमरों के साथ जानबूझकर छेड़छाड़ की गई, ताकि सबूत मिटाए जा सकें।
विभागीय नियमों के अनुसार यदि किसी धान संग्रहण केंद्र में 2 प्रतिशत से अधिक की कमी पाई जाती है, तो संबंधित प्रभारी को निलंबित करना, विस्तृत विभागीय जांच कराना और FIR दर्ज करना अनिवार्य है। इस मामले में शिकायतें सही पाए जाने के बाद प्रभारी को पद से हटा दिया गया है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि अब तक FIR दर्ज नहीं की गई। पर्याप्त दस्तावेजी साक्ष्य होने के बावजूद पुलिसिया कार्रवाई से बचना प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
अब जिले में यह चर्चा आम हो गई है कि यदि धान वास्तव में चूहे या दीमक खा गए, तो रिकॉर्ड में फर्जी एंट्री किसने की और CCTV से छेड़छाड़ की जरूरत क्यों पड़ी। वहीं, यदि सब कुछ नियमों के तहत था, तो फिर प्रभारी को हटाने की नौबत क्यों आई। यह मामला धीरे-धीरे उस सिस्टम की ओर इशारा कर रहा है, जहां घोटालों की जिम्मेदारी चूहों और दीमक पर डालकर असली दोषियों को बचाने की कोशिश की जाती है। सवाल अब सिर्फ धान के गायब होने का नहीं है, बल्कि सरकारी व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी गहरा प्रश्नचिह्न लग चुका है।







