नई दिल्ली।भारत की सबसे ऊंची संवैधानिक कुर्सियों पर आज वे चेहरे दिख रहे हैं, जिन्हें कभी वंचित, शोषित और समाज के हाशिए पर बताया जाता था। देश में सामाजिक न्याय का जो सपना वर्षों पहले देखा गया था, आज वह साकार रूप ले चुका है।
- राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू – जनजातीय समुदाय से आती हैं
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी – OBC वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं
- उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ – OBC वर्ग से
- कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल – अनुसूचित जाति (SC) से
- लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला – OBC समुदाय से
- कई राज्यों के मुख्यमंत्री – SC और OBC वर्ग से चुने गए हैं
यानी आज भारत की सबसे शक्तिशाली संवैधानिक संस्थाओं पर वही वर्ग नेतृत्व कर रहे हैं, जिन्हें दशकों तक वंचित और शोषित कहकर परिभाषित किया जाता रहा।
सवाल जो उठने लाजमी हैं:
- क्या अब भी “मनुवादी ब्राह्मणवाद” सत्ता में हावी है?
- या दशकों से चलाया गया “पीड़ित नैरेटिव” अब अपने राजनीतिक मकसद पूरे कर चुका है?
- क्या जातिगत राजनीति का डर और गुस्सा अब भी लोगों को गुमराह कर रहा है?
हकीकत यह है कि:
- भारत ने लोकतंत्र के रास्ते पर चलते हुए लंबी दूरी तय की है।
- सामाजिक न्याय अब केवल किताबों में नहीं, सत्ता के केंद्रों में दिख रहा है।
- वंचित कहे जाने वाले समुदाय आज नीति निर्माण में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।
लेकिन चिंता की बात यह है कि:
जहां एक ओर भारत सामाजिक समरसता की ओर बढ़ रहा है, वहीं कुछ ताकतें अब भी जातिगत पीड़ा का पुराना नैरेटिव बनाकर समाज को बांटने की कोशिश कर रही हैं।
अब समय है – एक नई शुरुआत का:
- जाति के नाम पर नफरत फैलाने वालों को बेनकाब करने का
- झूठे “दमन के ड्रामे” का पर्दाफाश करने का
- और भारत की वास्तविक प्रगति को स्वीकार करने का
नया भारत कहता है – अब जाति नहीं, योग्यता चलेगी।
अब सवाल पूछो – किसके लिए गढ़ा गया ब्राह्मणवाद का भूत?
और क्यों फैलाया जा रहा है डर का भ्रमजाल?
यह भारत का नया चेहरा है – जहां सामाजिक न्याय सत्ता में है और जातिगत भ्रम टूट रहे हैं।







