छत्तीसगढ़ से 11 सांसद लोकसभा पहुँचे हैं। कोई खुद कोदिग्गज कहलाता है, लेकिन आज छत्तीसगढ़ की हालत देखकर एक ही सवाल उठता है—ये सांसद आखिर किस काम के हैं? राज्य उजड़ रहा है और उसके प्रतिनिधि खामोश हैं।
सरगुजा का हसदेव जंगल लगातार उजाड़ा जा रहा है। आदिवासियों की जमीन छीनी जा रही है। रेल और खनन परियोजनाओं के नाम पर हरे-भरे जंगलों को कॉरपोरेट फायदे की भेंट चढ़ाया जा रहा है। यह सब खुलेआम हो रहा है, फिर भी संसद में छत्तीसगढ़ के सांसदों की आवाज़ सुनाई नहीं देती, जैसे जल जंगल ज़मीन और आदिवासी कोई मुद्दा ही न हों।
यह कांग्रेस बनाम भाजपा की लड़ाई नहीं है, यह छत्तीसगढ़ बनाम उसके सांसदों की सच्चाई है। दोनों दलों के सांसद यहां से जीतकर दिल्ली जाते हैं और वहां पहुंचते ही अपने राज्य को भूल जाते हैं। सत्ता पक्ष सत्ता का गुलाम है और विपक्ष सुविधा का।
कोरबा की हवा ज़हर बन चुकी है, सड़कें जानलेवा हैं। रायपुर में टीबी, अस्थमा और दूषित पानी आम हो चुका है। फिर भी इसे संसद में राष्ट्रीय संकट बताने की हिम्मत किसी में नहीं।
दूसरे राज्यों को महाकाल और काशी कॉरिडोर मिले, छत्तीसगढ़ को माइनिंग कॉरिडोर।
यह विकास नहीं, संगठित विश्वासघात है—और इतिहास इसे जरूर याद रखेगा।



