मानसून की बारिश के बीच राजधानी रायपुर के नकटी गांव में सोमवार का दिन सैकड़ों ग्रामीणों के लिए जिंदगी का सबसे मुश्किल दिन बन गया। विधायक कॉलोनी के लिए प्रशासन ने बुलडोजर चलाकर 80 से अधिक मकानों को ढहा दिया। ग्रामीणों का कहना है कि जिन घरों को उन्होंने वर्षों की मेहनत और जीवनभर की कमाई से बनाया था, वे कुछ ही घंटों में मलबे में बदल गए। इनमें प्रधानमंत्री आवास योजना और इंदिरा आवास योजना के तहत बने 32 मकान भी शामिल बताए जा रहे हैं।
सुबह से ही गांव पुलिस छावनी में तब्दील था। करीब 1000 से अधिक पुलिस जवानों की मौजूदगी में जेसीबी मशीनें गांव में दाखिल हुईं। ग्रामीण बुलडोजर के सामने खड़े हो गए और कार्रवाई रोकने की कोशिश की। इस दौरान पुलिस और ग्रामीणों के बीच धक्का-मुक्की हुई। विरोध बढ़ने पर कुछ लोगों द्वारा पथराव किए जाने की भी सूचना है, जिसके बाद सुरक्षा और कड़ी कर दी गई।

सबसे मार्मिक तस्वीरें तब सामने आईं जब महिलाएं अपने बच्चों को गोद में लेकर टूटे हुए घरों के मलबे के पास बैठी नजर आईं। बुजुर्ग अपनी जिंदगी की जमा-पूंजी को बिखरते हुए देखते रहे, जबकि कई परिवार बारिश के मौसम में अपना सामान खुले आसमान के नीचे रखने को मजबूर हो गए। ग्रामीणों का सवाल है कि अगर हटाना ही था, तो क्या पहले सुरक्षित पुनर्वास और रहने की व्यवस्था सुनिश्चित नहीं की जानी चाहिए थी?
प्रशासन का कहना है कि प्रभावित परिवारों को नया रायपुर के सेक्टर-30 स्थित EWS आवासों में बसाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। हालांकि कई ग्रामीणों का आरोप है कि जब तक वैकल्पिक आवास पूरी तरह उपलब्ध नहीं होता, तब तक घर तोड़ने की कार्रवाई नहीं होनी चाहिए थी।
नकटी गांव की यह कार्रवाई अब सिर्फ अतिक्रमण हटाने का मामला नहीं, बल्कि पुनर्वास, मानवीय संवेदनाओं और प्रशासनिक फैसलों पर भी सवाल खड़े कर रही है।





