रायगढ़, छत्तीसगढ़: मानव और जंगली हाथियों के बीच बढ़ते संघर्ष की दुखद कहानी एक बार फिर उभर कर सामने आई है। वन विभाग और स्थानीय किसानों के बीच सुरक्षा और आवश्यकताओं की चुनौतियाँ और तेज़ हो गई हैं।
घटना का वर्णन
बीते दिनों, रायगढ़ जिले में जंगलों से निकलकर हाथियों का एक बड़ा दल — अनुमानित 175 हाथियों का समूह — किसानों के खेतों में घुस आया और रात की अँधेरी बेला में 50 से अधिक किसानों की फसलों को रौंद डाला। इससे क्रिन्धा, बताती, रूवांफूल, कसेरडूगरू, सकालो, अलोला, कटाईपाली, बोजिया, साम्हरसिंघा सहित कई गांव प्रभावित हुए। हाथी मित्र दलों (इलेक्ट्रॉनिक मोनिटरिंग या सामुदायिक सचेत टीमों) ने घटना के बाद 24×7 सतर्कता बरती, लेकिन तब तक काफी नुकसान हो चुका था।
इसी बीच, धरमजयगढ़ वन मंडल के एक अन्य हिस्से में एक और घटना में, हाथियों ने 22 किसानों की फसल को रौंद डाला और एक मकान को क्षतिग्रस्त किया। यह हादसा भी रात्रि में ही हुआ, जिससे इलाके में खौफ़ का माहौल बन गया।
हाथियों की संख्या और उनका व्यवहार
वन विभाग के अनुसार, धरमजयगढ़ वन मंडल में कुल 139 हाथियाँ हैं — जिनमें 27 नर, 68 मादा और बाकी शावक शामिल हैं। इतनी अधिक संख्या में हाथियों की उपस्थिति ने स्थानीय किसानों में डर और खलबली मचा दी है।
प्रभाव और किसानों की प्रतिक्रिया
किसान खेती पर निर्भर अपनी आजीविका को बचाने की जद्दोजहद में हैं। फसलों का भारी नुक़सान उन्हें आर्थिक अनिश्चितता के कगार पर ला रहा है। वैसे भी किसान सरकार से मिलने वाले मुआवज़े को “ऊँट के मुंह में जीरे” के समान स्वीकार कर रहे हैं — क्योंकि वन विभाग द्वारा प्रति एकड़ अधिकतम 9,000 ₹ तक का मुआवज़ा मिलता है, जबकि एक एकड़ धान की कटाई पर किसान को लगभग 65,100 ₹ तक की कीमत मिलती है। यानी नुकसान की तुलना में मुआवज़ा बहुत नगण्य है।



