नागेन्द्र पाण्डेय, संपादक
कभी कहा जाता था कि चुनाव गांव की चौपाल, शहर की गलियों और जनसभाओं में जीते जाते हैं। अब तस्वीर बदल चुकी है। आज सबसे बड़ी चुनावी सभा किसी मैदान में नहीं, बल्कि मोबाइल की स्क्रीन पर लगती है। सवाल यह है कि उस सभा का संचालक कौन है—जनता या एल्गोरिद्म?
धर्मेंद्र प्रधान के इर्द-गिर्द बना डिजिटल माहौल इस नई राजनीति का उदाहरण माना जा सकता है। उनके विरोध में बड़ी मात्रा में रीलें, मीम और छोटे वीडियो सामने आए। देखते-देखते आलोचना एक डिजिटल लहर में बदलती दिखाई दी। यह केवल राजनीतिक विरोध नहीं था, बल्कि एक ऐसा ऑनलाइन विमर्श था जिसने बहस की दिशा ही बदल दी।
सोशल मीडिया का कारोबार भावनाओं पर चलता है। जितना विवाद, उतना प्रसार। जितना प्रसार, उतनी कमाई। ऐसे माहौल में राजनीति भी कंटेंट बन जाती है और नेता, एल्गोरिद्म के खेल का हिस्सा। सवाल यह नहीं कि किसने किसके खिलाफ वीडियो बनाया। सवाल यह है कि किसे बार-बार लोगों की स्क्रीन पर पहुंचाया गया और किसकी आवाज़ पीछे छूट गई।
यह कहना कि किसी एक प्लेटफ़ॉर्म ने किसी नेता की राजनीतिक स्थिति तय कर दी, एक ऐसा निष्कर्ष है जिसके लिए ठोस सार्वजनिक प्रमाण आवश्यक होंगे। लेकिन यह बहस पूरी तरह वैध है कि क्या एल्गोरिद्मिक प्राथमिकताएं सार्वजनिक विमर्श और मतदाताओं की धारणाओं को प्रभावित करती हैं। यदि ऐसा है, तो यह केवल धर्मेंद्र प्रधान का नहीं, पूरे लोकतंत्र का प्रश्न है।
आज राजनीतिक दलों को समझना होगा कि डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म केवल प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि जनमत निर्माण का सबसे शक्तिशाली अखाड़ा बन चुके हैं। जो इस लड़ाई में पीछे रह जाएगा, वह चुनाव से पहले ही नैरेटिव की जंग हार सकता है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत मतदाता है। लेकिन यदि मतदाता तक पहुंचने वाला विमर्श कुछ वायरल ट्रेंड, चुनिंदा क्लिप और एल्गोरिद्मिक प्राथमिकताओं से संचालित होने लगे, तो आने वाले समय में सबसे बड़ा सवाल यही होगा—क्या चुनाव जनता लड़ रही है, या जनता तक पहुंचने वाली स्क्रीन?





