बिलासपुर।एक तरफ छत्तीसगढ़ सरकार ने दिसंबर 2023 से 31 जनवरी 2025 तक केवल 14 महीनों में विज्ञापन और प्रचार-प्रसार पर ₹332.92 करोड़ खर्च किए। दूसरी तरफ, इसी राज्य के बिलासपुर जिले की शासकीय प्राथमिक शाला गनियारी में बच्चे जान जोखिम में डालकर पढ़ने को मजबूर हैं।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ के जनसंपर्क विभाग ने 14 महीनों (लगभग 428 दिनों) में विज्ञापन पर ₹332.92 करोड़ खर्च किए। इसका मतलब हुआ कि राज्य सरकार रोजाना औसतन ₹78 लाख विज्ञापनों पर उड़ा रही है। यह राशि इतनी अधिक है कि इसमें सैकड़ों स्कूलों का निर्माण या हजारों जर्जर स्कूलों का नवीनीकरण किया जा सकता था।

गनियारी स्कूल की दयनीय हालत
बिलासपुर जिले की शासकीय प्राथमिक शाला गनियारी की तस्वीर कुछ और ही पेश करती है। इस स्कूल का भवन इतना जर्जर हो चुका है कि कभी भी टूटकर गिर सकता है। दीवारों में बड़ी-बड़ी दरारें नजर आती हैं, जो किसी भी समय ध्वस्त होने की आशंका पैदा करती हैं।

स्कूल की छत की हालत और भी चिंताजनक है। आधी छत का प्लास्टर पहले ही गिर चुका है, और बची हुई छत भी किसी भी वक्त गिर सकती है। बारिश के मौसम में तो स्थिति और भी खराब हो जाती है, जब पानी टपकने लगता है और बच्चे भीगते हुए पढ़ने को मजबूर हो जाते हैं।
ऐसे असुरक्षित वातावरण में पढ़ने वाले बच्चों के माता-पिता भी चिंतित हैं। वे कहते हैं कि वे अपने बच्चों को स्कूल भेजते तो हैं, लेकिन हर वक्त यही डर लगा रहता है कि कहीं भवन गिरने से कोई अनहोनी न हो जाए।

गनियारी अकेला मामला नहीं है। बिलासपुर जिले में ऐसे कई स्कूल हैं जिनकी हालत इससे भी बदतर है। तखतपुर ब्लॉक में स्थित शासकीय प्राथमिक शाला सरसेनी में पिछले 7 साल से पांच कक्षाएं एक ही कमरे में चल रही हैं। वहां का भवन भी जर्जर है और बच्चे असुरक्षित वातावरण में पढ़ने को मजबूर हैं।
बुनियादी शिक्षा सुविधाओं पर ध्यान क्यों नहीं दिया जा रहा? ₹332 करोड़ में न केवल गनियारी जैसे सैकड़ों स्कूलों का नवीनीकरण किया जा सकता था, बल्कि नए स्कूल भी बनाए जा सकते थे। जब तक स्कूलों की बुनियादी संरचना सुरक्षित नहीं होगी, तब तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात करना बेमानी है।
जब एक राज्य सरकार विज्ञापन पर इतना खर्च कर सकती है, तो उसी राज्य के बच्चों को सुरक्षित स्कूल न मिलना प्रशासनिक विफलता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।






