आज सुबह जो दृश्य मैंने देखा, उसने भीतर तक झकझोर दिया। मन बेहद विचलित है। यह केवल एक कस्बे की घटना नहीं, बल्कि उस भयावह भविष्य की झलक है, जिसकी ओर हमारा देश तेजी से बढ़ रहा है।
सुबह के करीब पाँच बजे का समय था। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं और वे स्कूल जाने की तैयारी कर रहे होने चाहिए थे, उसी उम्र के कुछ बच्चे एक पान की दुकान के सामने खड़े थे। कोई बीड़ी-सिगरेट मांग रहा था, तो कोई दुकानदार का छोटा-मोटा काम कर रहा था, ताकि बदले में नशा मिल जाए।
जिज्ञासा हुई तो एक बच्चे से पूछा, “क्या तुम लोग स्कूल में भी यह सब लेकर जाते हो? कोई कुछ नहीं कहता?”
पास खड़ा लगभग 14 साल का लड़का मुस्कुराते हुए बोला, “यह तो कुछ भी नहीं, देखो मेरे पास क्या है।” उसने अपनी जेब से गांजे का पैकेट निकालकर दिखाया।
जब पूछा कि यह कहाँ से मिला, तो उसका जवाब और भी डराने वाला था—”जहाँ पूछो, वहाँ मिल जाएगा। दुकान वाला मेरे लिए अलग से रखता है। मैं रोज का ग्राहक हूँ।”
मैंने पूछा, “जब घर वाले पैसे देना बंद कर देंगे, तब क्या करोगे?”
उसका जवाब था—”चोरी करूँगा… किसी को मार दूँगा… पैसे तो मिल ही जाएंगे।”
इतने में लगभग 10 साल का एक और बच्चा वहाँ आया। बड़े लड़के ने उससे पूछा, “तंबाकू लाया?” उसने कहा, “हाँ, लेकिन तुझे नहीं दूँगा।” बस इतनी सी बात पर दोनों में मारपीट शुरू हो गई। कुछ देर बाद दोनों ने साथ बैठकर तंबाकू तैयार की और नशा करने लगे।
यह घटना किसी फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि हमारे समाज की कड़वी सच्चाई है।
यह केवल एक कस्बे की समस्या नहीं, पूरे देश का संकट है
यदि राष्ट्रीय स्तर के उपलब्ध आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर और भी भयावह दिखाई देती है।
- लगभग 40 लाख बच्चे और किशोर ओपिओइड (अफीम, हेरोइन आदि) की गिरफ्त में हैं।
- करीब 30 लाख बच्चे नियमित रूप से शराब का सेवन कर रहे हैं।
- लगभग 30 लाख बच्चे इनहेलेंट्स (थिनर, व्हाइटनर, सॉल्यूशन जैसे रसायन) सूंघने के आदी हैं।
- करीब 20 लाख नाबालिग भांग और गांजे का सेवन कर रहे हैं।
- लगभग 20 लाख बच्चे बिना चिकित्सकीय सलाह के नशीली दवाइयों और गोलियों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
ये आंकड़े केवल संख्या नहीं हैं, बल्कि लाखों परिवारों के टूटते सपनों और बर्बाद होते भविष्य की कहानी हैं।
सबसे बड़ा सवाल
यदि 10 से 14 वर्ष की उम्र में बच्चे यह कहने लगें कि “पैसे नहीं मिले तो चोरी करूँगा, किसी को मार दूँगा”, तो यह केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि पूरे समाज के नैतिक पतन का संकेत है।
आज नशे के लिए चोरी होगी, कल लूट होगी, फिर हत्या होगी और आगे चलकर यही युवा संगठित अपराध, तस्करी और देशविरोधी गतिविधियों का हिस्सा भी बन सकते हैं। नशा केवल व्यक्ति को नहीं मारता, यह परिवार, समाज और राष्ट्र की नींव को खोखला कर देता है।
जिम्मेदार कौन?
- क्या केवल नशा बेचने वाले?
- क्या केवल प्रशासन?
- क्या केवल परिवार?
- या फिर हम सब?
जब नाबालिगों को खुलेआम बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू, गांजा और अन्य नशीले पदार्थ मिल रहे हों, तब यह स्पष्ट है कि कहीं न कहीं हमारी व्यवस्था कमजोर पड़ रही है।
अब केवल भाषण नहीं, कठोर कार्रवाई की जरूरत
- नाबालिगों को नशा बेचने वालों पर तत्काल और कठोर कार्रवाई हो।
- स्कूलों में नियमित नशा मुक्ति जागरूकता अभियान चलाए जाएँ।
- प्रत्येक जिले में बाल एवं किशोर नशा मुक्ति केंद्र स्थापित किए जाएँ।
- माता-पिता को भी बच्चों के व्यवहार और मित्र मंडली पर गंभीरता से ध्यान देना होगा।
- पुलिस, शिक्षा विभाग, स्वास्थ्य विभाग और समाज को मिलकर संयुक्त अभियान चलाना होगा।
बाल अधिकार संरक्षण आयोग की जिम्मेदारी
राष्ट्रीय एवं राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोगों को इस विषय पर विशेष अभियान चलाना चाहिए। नाबालिगों तक नशे की पहुँच रोकने के लिए विशेष निगरानी, शिकायत तंत्र और त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। बच्चों का बचपन सुरक्षित रखना केवल सरकार की नहीं, पूरे समाज की जिम्मेदारी है।
आखिर में…
यदि आज भी हम नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ नहीं करेंगी। देश की सबसे बड़ी पूंजी उसके बच्चे हैं। यदि वही नशे की गिरफ्त में चले गए, तो विकसित भारत का सपना केवल कागज़ों तक सीमित रह जाएगा।
आज जरूरत केवल नशा मुक्ति अभियान की नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय जनआंदोलन की है।
संपादकीय — नागेंद्र पांडे( MBP)





