इथेनॉल को लेकर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के चरित्र का हनन और उन्हें बदनाम करने की कोशिश विपक्ष की राजनीति का हिस्सा बनती दिखाई दे रही है। E20 नीति को लेकर जिस तरह का राजनीतिक विवाद खड़ा किया गया है, उसमें नीति के वास्तविक फायदे-नुकसान पर चर्चा से ज्यादा व्यक्तिगत आरोपों और राजनीतिक नैरेटिव को तवज्जो मिलती नजर आ रही है।
यह स्थिति इसलिए चिंताजनक है क्योंकि इथेनॉल ब्लेंडिंग कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही राष्ट्रीय नीति का हिस्सा है। देश को भ्रमित करने की कोशिश का आरोप उस समय और गंभीर हो जाता है, जब किसी नीति को लेकर आज का राजनीतिक रुख उसी दल के पुराने रुख से बिल्कुल अलग दिखाई दे। पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर कांग्रेस की मौजूदा स्थिति इसी विरोधाभास को सामने ला रही है।
कांग्रेस के पूर्व पेट्रोलियम मंत्री मणिशंकर अय्यर ने वर्ष 2005 में संसद में पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की नीति का समर्थन किया था। अपने भाषण में उन्होंने कहा था कि सरकार ने पेट्रोल में 10 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण का निर्णय लिया है। साथ ही उन्होंने भविष्य में इथेनॉल की उपलब्धता बढ़ने पर ब्लेंडिंग को 20 प्रतिशत, 30 प्रतिशत या उससे भी अधिक तक बढ़ाने की बात कही थी।
यानी जिस दिशा की बात कांग्रेस सरकार के दौर में संसद में की गई थी, आज उसी दिशा में देश के आगे बढ़ने पर कांग्रेस विरोध करती नजर आ रही है। केंद्र सरकार की E20 नीति के तहत पेट्रोल में 20 प्रतिशत तक इथेनॉल मिश्रण को लेकर कांग्रेस लगातार सवाल उठा रही है और इसे वाहनों के माइलेज तथा आम उपभोक्ता पर पड़ने वाले असर से जोड़ रही है।
सवाल नीति पर नहीं, बदलते रुख पर है
E20 से जुड़े तकनीकी, आर्थिक और उपभोक्ता हितों के सवालों पर चर्चा होनी चाहिए। पुराने वाहनों की संगतता, माइलेज और उपभोक्ताओं पर संभावित प्रभाव जैसे मुद्दों का समाधान सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन इन समस्याओं के समाधान और पूरी इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति का विरोध करने में अंतर है।
जब कांग्रेस के ही पूर्व पेट्रोलियम मंत्री भविष्य में 20 प्रतिशत, 30 प्रतिशत या उससे अधिक इथेनॉल ब्लेंडिंग की संभावना को संसद में स्वीकार कर चुके थे, तब आज उसी लक्ष्य के लागू होने पर पूरी नीति पर सवाल खड़े करना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक बहस को जन्म देता है।
इथेनॉल ब्लेंडिंग का उद्देश्य पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करना और ऊर्जा के क्षेत्र में देश को अधिक आत्मनिर्भर बनाना भी रहा है। ऐसे में नीति में कमियां हैं तो उन्हें दूर किया जाना चाहिए, लेकिन राजनीतिक विरोध के नाम पर पूरी नीति को खारिज करने की कोशिश देशहित के सवाल खड़े कर सकती है।
बहस होनी चाहिए कि E20 को बेहतर कैसे बनाया जाए, न कि इस बात पर कि जिस नीति की दिशा कभी कांग्रेस ने खुद तय की थी, आज उसका राजनीतिक विरोध क्यों किया जा रहा है।






