पटना।प्रशांत किशोर राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाने और लंबे समय तक असर छोड़ने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं। उनकी राजनीति का तरीका पारंपरिक राजनीति से कुछ अलग दिखाई देता है। वे जातीय समीकरणों के बजाय मुद्दों, विचारों और नई राजनीतिक सोच को सामने रखने पर जोर देते रहे हैं।
प्रशांत किशोर को लेकर अक्सर यह चर्चा होती रही है कि उनकी राजनीति केवल जाति या किसी पारंपरिक राजनीतिक पहचान तक सीमित नहीं है। वे मतदाताओं के बीच मुद्दों और नए राजनीतिक विकल्पों के आधार पर अपनी जगह बनाने की कोशिश करते दिखाई देते हैं।
बांकीपुर के मतदाताओं का फैसला बना उदाहरण
बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र की राजनीति को देखें तो लोकतंत्र में मतदाताओं के पास उम्मीदवार को उसकी पहचान से अलग उसके विचार और काम के आधार पर परखने का अधिकार है। अगर मतदाता केवल चेहरा, जाति, धर्म या राजनीतिक झंडा देखकर वोट करे, तो संभव है कि वह किसी ऐसे नेतृत्व को मौका देने से चूक जाए, जो राजनीति में नई दिशा देने की क्षमता रखता हो।
लोकतंत्र की असली खूबसूरती यही है कि मतदाता किसी भी उम्मीदवार का फैसला उसके काम, विचार, नीतियों और नेतृत्व क्षमता को देखकर कर सकता है।
पारंपरिक राजनीति से अलग पहचान की कोशिश
प्रशांत किशोर की राजनीतिक यात्रा को इसी नजरिए से देखें तो वे राजनीति की पुरानी लकीर पर चलने के बजाय अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश करते नजर आते हैं। उनका जोर राजनीतिक सोच और जनता से जुड़े मुद्दों को केंद्र में रखने पर दिखाई देता है।
अब सवाल यह है कि क्या आने वाले समय में मतदाता जाति, धर्म, चेहरे और राजनीतिक झंडे से ऊपर उठकर उम्मीदवार की सोच और उसके काम को प्राथमिकता देंगे?
राजनीति में बदलाव तभी संभव है, जब मतदाता अपने प्रतिनिधि का चुनाव उसकी सोच, काम और नेतृत्व क्षमता के आधार पर करे। इसी वजह से कहा जा सकता है कि नेता की पहचान उसके चेहरे, जाति, धर्म या झंडे से नहीं, बल्कि उसकी सोच और काम से होनी चाहिए।





