रायपुर।छत्तीसगढ़ शासन की जनसंपर्क पत्रिका ‘जनमन’ के संपादक डॉ. अनिल द्विवेदी की एक सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। शिक्षा और आरक्षण व्यवस्था से जुड़ी उनकी एक पोस्ट वायरल होने के बाद जहां कई सामाजिक संगठनों, विपक्षी नेताओं और बुद्धिजीवियों ने इस पर आपत्ति जताई है, वहीं बड़ी संख्या में लोग उनके समर्थन में भी सामने आए हैं।
क्या है पूरा मामला?
हाल ही में डॉ. अनिल द्विवेदी के सोशल मीडिया अकाउंट से शिक्षा और आरक्षण व्यवस्था को लेकर की गई एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी तेजी से वायरल हुई। इस पोस्ट के बाद विवाद शुरू हो गया। आलोचकों का कहना है कि ‘जनमन’ जैसी सरकारी पत्रिका के संपादक पद पर बैठे व्यक्ति को सार्वजनिक मंच पर इस तरह की टिप्पणी करने से बचना चाहिए। उनके मुताबिक ऐसी बातें संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक संवेदनशीलता के अनुरूप नहीं हैं।
आलोचकों का कहना है कि सरकारी जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारियों और संपादकों को संविधान की भावना और सामाजिक समरसता का ध्यान रखना चाहिए। उनका यह भी मानना है कि आरक्षण और वंचित वर्गों से जुड़े मुद्दों पर इस तरह की टिप्पणी से सामाजिक सौहार्द प्रभावित हो सकता है।
समर्थन में क्या कह रहे हैं लोग?
दूसरी ओर, सोशल मीडिया और साहित्यिक जगत से जुड़े कई लोग डॉ. अनिल द्विवेदी के समर्थन में भी खुलकर सामने आए हैं। उनका कहना है कि इस मामले को जरूरत से ज्यादा तूल दिया जा रहा है।
समर्थकों का तर्क है कि हर नागरिक की तरह एक लेखक या बुद्धिजीवी को भी अपने निजी सोशल मीडिया अकाउंट पर सामाजिक और शैक्षणिक मुद्दों पर अपनी राय रखने का अधिकार है।
उनका यह भी कहना है कि किसी व्यक्ति के निजी विचार और उसके सरकारी पद को अलग-अलग नजरिए से देखा जाना चाहिए। समर्थकों के मुताबिक सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणी उनके व्यक्तिगत विचार या साहित्यिक व्यंग्य का हिस्सा हो सकती है, जिसका उनके शासकीय दायित्व या पत्रिका के संपादन से सीधा संबंध नहीं है।
कुछ लोगों का यह भी कहना है कि शिक्षा और चयन प्रक्रिया में योग्यता (मेरिट) जैसे मुद्दों पर खुली और स्वस्थ बहस होनी चाहिए और किसी लेखक की राय को सीधे दुर्भावना से नहीं जोड़ना चाहिए।
प्रशासनिक स्तर पर भी नजर
विवाद सामने आने के बाद से यह मुद्दा सोशल मीडिया, डिजिटल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। एक पक्ष इसे सामाजिक संवेदनशीलता से जुड़ा मामला बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में रखकर देख रहा है।






