कुलसचिव पर पद के दुरुपयोग और जबरन वसूली का आरोप
दुर्ग :हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग से एक बड़ा प्रशासनिक और वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने कुलसचिव भूपेंद्र कुमार कुलदीप पर अपने पद का दुरुपयोग करने, जबरन वसूली करने और एक दैनिक वेतनभोगी महिला कर्मचारी का शोषण करने के गंभीर आरोपों के तहत पुलिस में मामला दर्ज करने की सिफारिश की है। इस संबंध में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डॉ.) संजय तिवारी और प्रभारी कुलसचिव द्वारा पुलिस उप महानिरीक्षक (DIG) एवं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP), दुर्ग को औपचारिक पत्र भेजकर त्वरित प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने और वैधानिक कार्रवाई करने का अनुरोध किया गया है।



शासकीय कार्य के बजाय कराया घरेलू काम
पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब विश्वविद्यालय में पदस्थ एक अर्धकुशल दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी शुभांगी मराठे ने कुलपति के समक्ष लिखित शिकायत और नोटरी-सत्यापित शपथ पत्र प्रस्तुत किया। कर्मचारी ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया कि उन्हें विश्वविद्यालय के शासकीय कार्यों में लगाने के बजाय कुलसचिव भूपेंद्र कुमार कुलदीप द्वारा अपने निजी निवास पर खाना बनाने जैसे घरेलू कामों के लिए बाध्य किया गया।
वेतन का 84% हिस्सा पुत्र के खाते में कराने का दबाव
महिला कर्मचारी के अनुसार, नौकरी से निकाले जाने के भय और दबाव के कारण उन्हें अपने वेतन की अधिकांश राशि सरेंडर करनी पड़ती थी। विश्वविद्यालय निधि से उनके बैंक खाते में हर महीने जमा होने वाले वेतन में से उन्हें मात्र 2,200 रुपये ही रखने दिए जाते थे। शेष पूरी राशि वेतन मिलते ही UPI और PhonePe के माध्यम से कुलसचिव के पुत्र उदय प्रताप कुलदीप के भारतीय स्टेट बैंक खाते में स्थानांतरित करा ली जाती थी।


जांच समिति के खुलासे में मिला 17 महीनों का रिकॉर्ड
मामले की गंभीरता को देखते हुए विश्वविद्यालय द्वारा एक तथ्यान्वेषी (Fact Finding) जांच समिति का गठन किया गया था। समिति ने पीड़ित कर्मचारी के यूको बैंक पासबुक विवरण और PhonePe लेनदेन का प्रत्यक्ष मिलान किया। फरवरी 2025 से जुलाई 2026 (लगभग 17 माह) के रिकॉर्ड की जांच में पाया गया कि इस अवधि में विश्वविद्यालय द्वारा कर्मचारी को कुल 1,77,137 रुपये वेतन दिया गया था, जिसमें से 1,49,384 रुपये (लगभग 84.3 प्रतिशत राशि) वेतन जमा होने के 1 से 3 दिनों के भीतर ही कुलसचिव के पुत्र के खाते में ट्रांसफर कर दिए गए थे।


पुलिस प्रशासन से FIR और सुरक्षा की मांग
जांच समिति ने अपने निष्कर्ष में इस लेनदेन को एक सुसंगत और सुनियोजित पैटर्न माना है। चूंकि यह मामला एक लोक सेवक द्वारा शासकीय निधि के दुरुपयोग, जबरन उगाही और आपराधिक अभित्रास से जुड़ा है, इसलिए इसे भारतीय न्याय संहिता 2023 एवं भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत आपराधिक कृत्य माना गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने पुलिस से संबंधितों के खिलाफ FIR दर्ज करने, अवैध रूप से वसूली गई राशि वापस कराने और पीड़ित महिला कर्मचारी व उनके परिवार को प्रतिशोध से सुरक्षा प्रदान करने की मांग की है।





