न कोई नाम– न पहचान… आखिर कौन सी है ये छोटी सी NCPI?

Madhya Bharat Desk
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नई दिल्ली / कोलकाता:
भारतीय राजनीति के गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। ‘नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) ने देश के सियासी परिदृश्य पर एक बहुत बड़ा धमाका किया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर लंबे समय से चल रही अंदरूनी कलह का फायदा उठाते हुए NCPI ने बंगाल की राजनीति में अब तक की सबसे बड़ी सेंधमारी की है।

लोकसभा में टीएमसी के संसदीय दल के नेता रहे वरिष्ठ राजनेता सुदीप बंद्योपाध्याय की अगुवाई में करीब 20 बागी सांसदों के एक बड़े धड़े ने आधिकारिक तौर पर ‘नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) का दामन थाम लिया है। इस ऐतिहासिक विलय के बाद NCPI अचानक भारतीय संसद और राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गई है।

NCPI के मंच पर जुटे बंगाल की राजनीति के दिग्गज चेहरे

‘नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया’ के दिल्ली स्थित मुख्यालय और राष्ट्रीय मंच पर बंगाल के कई कद्दावर नेताओं ने एक साथ सदस्यता ली। NCPI में शामिल होने वाले प्रमुख चेहरों में शामिल हैं:

  • सुदीप बंद्योपाध्याय: टीएमसी के सबसे अनुभवी सांसदों में से एक और ममता बनर्जी के पूर्व रणनीतिकार, जो अब NCPI के राष्ट्रीय कुनबे का हिस्सा हैं।
  • काकोली घोष दस्तीदार: संसद में मुखर रहने वालीं वरिष्ठ महिला नेत्री और सांसद।
  • शताब्दी रॉय: वीरभूम से लगातार अपनी लोकप्रियता का परचम लहराने वालीं सांसद और जानी-मानी अभिनेत्री।
    इन दिग्गजों के साथ-साथ करीब 20 सांसदों के इस गुट के आने से NCPI की ताकत में अप्रत्याशित रूप से भारी इजाफा हुआ है।

सुदीप बंद्योपाध्याय और बागी गुट ने NCPI को ही क्यों चुना?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, टीएमसी से बगावत करने के बाद इस गुट के पास कई विकल्प थे, लेकिन उन्होंने ‘नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) पर ही भरोसा जताया। इसके पीछे मुख्य कारण इस प्रकार हैं:

1. एक मजबूत और स्वतंत्र राष्ट्रीय मंच की तलाश

बागी गुट तृणमूल कांग्रेस में अपनी उपेक्षा और एकतरफा फैसलों से नाराज था। वे किसी ऐसी राष्ट्रीय पार्टी की तलाश में थे जहाँ उनके अनुभव को पूरा सम्मान मिले और NCPI ने उन्हें वह मंच और आजादी प्रदान की।

2. क्षेत्रीय अस्मिता और राष्ट्रीय दृष्टिकोण का तालमेल

NCPI की नीतियां राष्ट्रीय विकास के साथ-साथ क्षेत्रीय मुद्दों को भी तरजीह देती हैं। सुदीप बंद्योपाध्याय और उनके सहयोगियों का मानना है कि NCPI के बैनर तले वे पश्चिम बंगाल की जनता के हक की लड़ाई को दिल्ली में और अधिक मजबूती से उठा सकेंगे।

NCPI को कई रिपोर्टों में त्रिपुरा आधारित पार्टी बताया जा रहा है। हालाँकि निर्वाचन आयोग के दस्तावेजों के अनुसार, इसका मुख्यालय जागो बिस्वा, होल्डिंग नंबर 4719, ग्राम हाटगाछा, डाकघर बनिपुर, थाना सांकरैल, जिला हावड़ा, पश्चिम बंगाल – 711304 में स्थित है। इसलिए, कई रिपोर्टों में किए जा रहे दावों के विपरीत, यह पार्टी वास्तव में पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में आधारित है।

संसद से लेकर सड़क तक: NCPI के इस कदम के मायने

इस महा-विलय का भारतीय राजनीति पर बेहद दूरगामी असर पड़ने वाला है:

  • संसद में NCPI की ताकत बढ़ी: 20 लोकसभा सांसदों के अचानक जुड़ जाने से संसद के निचले सदन में NCPI की ताकत और आवाज रातों-रात बेहद मजबूत हो गई है। अब सदन के भीतर किसी भी बड़े बिल या चर्चा में NCPI की भूमिका निर्णायक होगी।
  • बंगाल में तीसरे विकल्प के रूप में उभरी पार्टी: पश्चिम बंगाल में अब तक मुख्य मुकाबला टीएमसी और बीजेपी के बीच सिमटा हुआ था। लेकिन सुदीप बंद्योपाध्याय जैसे बड़े चेहरे के NCPI में आने के बाद, राज्य की जनता को अब एक मजबूत और नया विकल्प मिल गया है।
  • ममता बनर्जी को अब तक का सबसे बड़ा झटका: संसद में अपनी ताकत घटने से टीएमसी बैकफुट पर आ गई है। ममता बनर्जी के लिए अपने बचे हुए सांसदों और संगठन को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती बन गया है।

NCPI नेतृत्व का बयान: “यह देश में बदलाव की शुरुआत है”

इस ऐतिहासिक विलय पर ‘नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) के शीर्ष नेतृत्व ने खुशी जताते हुए कहा कि सुदीप बंद्योपाध्याय और उनके साथी सांसदों का पार्टी में स्वागत है। पार्टी ने कहा, “यह विलय इस बात का प्रतीक है कि देश के अनुभवी और ईमानदार नेता NCPI की नीतियों और दूरदर्शिता पर भरोसा कर रहे हैं। हम मिलकर संसद से लेकर सड़क तक जनता के मुद्दों को उठाएंगे और बंगाल सहित पूरे देश में एक सकारात्मक राजनीतिक बदलाव लाएंगे।”
इस बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के बाद देश की सियासत किस करवट बैठती है।

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