230 करोड़ की अमृत मिशन योजना पर सवाल, राजनांदगांव के कई वार्ड आज भी टैंकरों के भरोसे

Madhya Bharat Desk
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शहर में पेयजल संकट दूर करने के लिए नगर निगम द्वारा अमृत मिशन योजना के तहत करीब 230 करोड़ रुपए खर्च कर 51 वार्डों में नई पाइपलाइन बिछाई गई थी। दावा किया गया था कि इस परियोजना से अगले 30 वर्षों तक पानी की समस्या नहीं होगी, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट नजर आ रही है। करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद शहर के कई वार्ड आज भी टैंकरों के सहारे हैं।

नगर निगम के आंकड़ों के अनुसार शहर के बाबूटोला, नया ढाबा, लखोली, रेवाडीह, पेंड्री, कौरिनभांठा, चिखली, शंकरपुर, मोहारा, हल्दी, कन्हारपुरी, राजीव नगर और बसंतपुर समेत दर्जनभर से अधिक वार्डों में प्रतिदिन लगभग 75 टैंकरों से पानी पहुंचाया जा रहा है। इसके लिए रोजाना करीब 250 लीटर से अधिक डीजल खर्च हो रहा है, जिस पर लगभग 25 हजार रुपए प्रतिदिन की राशि खर्च की जा रही है।

30 साल की योजना, 8 साल में ही सवालों के घेरे में

जानकारी के मुताबिक वर्ष 2017 में अमृत मिशन योजना की शुरुआत शहर की बढ़ती आबादी और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर की गई थी। योजना का उद्देश्य 51 वार्डों में बेहतर और निर्बाध पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करना था। लेकिन आठ साल बाद भी कई इलाकों में जल संकट बना हुआ है, जिससे योजना की प्रभावशीलता पर सवाल उठने लगे हैं।

45 हजार से अधिक नल कनेक्शन, फिर भी नहीं मिल रहा पर्याप्त पानी

शहर में वर्तमान में 45 हजार से अधिक घरेलू नल कनेक्शन हैं। इसके बावजूद आउटर और भीतरी क्षेत्रों के कई मोहल्लों में पर्याप्त जलापूर्ति नहीं हो पा रही है। नगर निगम को प्रभावित इलाकों में रोजाना टैंकर भेजकर पानी की व्यवस्था करनी पड़ रही है।

रोज 4 करोड़ लीटर पानी की खपत

गर्मी की शुरुआत के साथ ही शहर में पानी की मांग बढ़ गई है। नगर निगम के अनुसार राजनांदगांव में प्रतिदिन लगभग 4 करोड़ लीटर से अधिक पानी की खपत हो रही है। बावजूद इसके कई वार्डों तक पर्याप्त पानी नहीं पहुंच पा रहा, जिससे लोगों की निर्भरता टैंकरों पर बनी हुई है।

जर्जर टैंकरों से हो रही पानी की बर्बादी

जलापूर्ति में लगाए गए कई टैंकर पुराने और जर्जर हो चुके हैं। पानी सप्लाई के दौरान बड़ी मात्रा में पानी रास्ते में ही बह जाता है। वहीं टैंकर पहुंचते ही पानी भरने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है, जिससे अव्यवस्था की स्थिति भी बन रही है।

जनता के सवाल

करोड़ों रुपए खर्च कर तैयार की गई अमृत मिशन योजना के बाद भी यदि लोगों को पानी के लिए टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ रहा है, तो योजना की गुणवत्ता, पाइपलाइन नेटवर्क और वितरण व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। अब नागरिक यह जानना चाहते हैं कि आखिर 230 करोड़ रुपए की परियोजना के बावजूद पानी की समस्या का स्थायी समाधान क्यों नहीं हो सका।

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