देश में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। 31 मार्च तक “नक्सल मुक्त भारत” का लक्ष्य तय किया गया है, और इस डेडलाइन से ठीक पहले सुरक्षा बलों ने अपनी कार्रवाई और तेज कर दी है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में चल रहे इस अभियान में अब आखिरी चरण की तैयारी चल रही है।
पिछले कुछ महीनों में सुरक्षाबलों को बड़ी सफलता मिली है। कई शीर्ष नक्सली या तो मारे गए हैं या उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया है, जिससे संगठन की ताकत काफी कमजोर हो चुकी है। अब खुफिया एजेंसियों के मुताबिक सिर्फ 100 से 150 नक्सली ही बचे हैं, जो छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और तेलंगाना के घने जंगलों में छिपे हुए हैं।
इन बचे हुए नक्सलियों के खिलाफ अब बड़े स्तर पर सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है, जिसमें करीब 50 हजार जवान शामिल हैं। इस अभियान में कोबरा कमांडो, केंद्रीय अर्धसैनिक बल और राज्यों की पुलिस मिलकर काम कर रही है। सुरक्षा एजेंसियों को उम्मीद है कि इस दबाव के चलते कई नक्सली आत्मसमर्पण कर सकते हैं, जबकि बाकी को ऑपरेशन के जरिए पकड़ लिया जाएगा।
जंगलों में लड़ाई के लिए खास तौर पर तैयार किए गए कोबरा कमांडो इस मिशन की सबसे मजबूत कड़ी माने जा रहे हैं। उनकी ट्रेनिंग इतनी कठिन होती है कि वे लंबे समय तक बिना किसी बाहरी मदद के भी ऑपरेशन को अंजाम दे सकते हैं।
हालांकि नक्सलियों की ताकत पहले जैसी नहीं रही, लेकिन खतरा अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। वे बड़े हमलों की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन IED ब्लास्ट जैसे तरीकों से सुरक्षाबलों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर सकते हैं। यही वजह है कि ऑपरेशन के दौरान अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है।
सुरक्षा बल केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे गांव-गांव जाकर लोगों का भरोसा जीतने की भी कोशिश कर रहे हैं। विकास योजनाओं की जानकारी देना, स्थानीय लोगों से संवाद करना और खुफिया इनपुट जुटाना इस रणनीति का हिस्सा है, ताकि नक्सलवाद को जड़ से खत्म किया जा सके।







