सोशल पोस्ट पर 300-400 लाइक, 1095 करोड़ का फल क्या मिला? या राज्यकोस की लूट ?

Madhya Bharat Desk
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छत्तीसगढ़ विधानसभा में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के लिखित जवाब ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है — 1 जनवरी 2024 से 31 मार्च 2026 के बीच जनसंपर्क विभाग ने प्रचार-प्रसार पर कुल ₹10,95,20,36,698 (1095.20 करोड़) खर्च किए। लेकिन इस भारी-भरकम खर्च एक बड़ा मज़ाक है ,जनता के साथ क्योंकि आम आदमी आज भी सरकार की योजनाओं से अनजान है। यदि इतनी रकम किसी जिले या ब्लॉक को दी होती तो उसके विकास की तस्वीर अलग होती; फिर भी जनता को कोई ठोस लाभ या स्पष्ट सूचना नहीं मिली।

खर्च का ब्योरा साफ-साफ बताता है कि पैसा किस दिशा में गया:

• क्षेत्र प्रचार: ₹414.01 करोड़

• इलेक्ट्रॉनिक मीडिया: ₹344.04 करोड़

• प्रिंट मीडिया: ₹198.26 करोड़

• सोशल डिजिटल मीडिया: ₹55.81 करोड़

• विशेष अवसर पर प्रचार: ₹35.92 करोड़

• आदिवासी उपयोजना के तहत प्रचार: ₹22.17 करोड़

• प्रकाशन मीडिया: ₹19.17 करोड़

• सोशल मीडिया: ₹5.78 करोड़

ये आंकड़े दर्शाते हैं कि सबसे बड़ा हिस्सा क्षेत्र प्रचार और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर खर्च हुआ — यानी ड्राइव, कार्यक्रम, चैनलों पर विज्ञापन व स्पॉट्स। पर सवाल यही है: इतने व्यापक प्रचार के बावजूद आम आदमी के पास योजनाओं की ठोस जानकारी क्यों नहीं पहुँच पाई? मुख्यमंत्री और उनके मंत्री यह कहते आए हैं कि प्रचार का मकसद जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी पहुँचना है, मगर जमीन पर हालात कुछ और बयां करते हैं।

लाखों पर खर्च, लाइक-डिसलाइक का खेल

सरकारी सोशल मीडिया प्रोफाइल देखें या मुख्यमंत्री की प्रोफाइल देखे — पोस्ट पर 300–400 लाइक की औसत रेंज, कमतर इंगेजमेंट और अक्सर रिप्लाई-बॉक्स में नाराज दिखते हैं लोग। डिजिटल खर्च का बड़ा हिस्सा सोशल/डिजिटल प्लेटफॉर्म पर गया, पर वहां की पहुंच और भरोसेमंद जानकारी की गुणवत्ता पर बड़ा प्रश्न खड़ा है। कई बार प्रचार सिर्फ शोर बनकर रह गया — चमक-दमक वाली रिपोर्ट, स्टेज-इवेंट की तस्वीरें, पर वास्तविक काम या योजनाओं का असर जनता तक स्पष्ट रूप में नहीं पहुँचा।

सरकार क्या यहाँ तथ्य पेश कर सकती है? 

प्रत्येक श्रेणी के खर्च के साथ परिणाम दिखाये — कितने लोगों तक सूचना गई, कितने आवेदन बढ़े, कितनी सेवाएँ मिलीं। जिले-वार और ब्लॉक-वार रिपोर्ट सार्वजनिक करे कि क्षेत्र प्रचार का सीधा प्रभाव कहाँ दिखा।डिजिटल अभियान के मासिक लक्ष्य, पहुंच (reach) और वास्तविक इंटरैक्शन के डेटा साझा करे। प्रचार सामग्री की भाषा और स्थानीयता की जाँच करें — क्या आदिवासी/ग्रामीण भाषा में, स्थानीय मीडिया में सही ढंग से संदेश गया?

1095 करोड़ रुपये का प्रचार-प्रसार किसी नज़र-बंदी रिपोर्ट की तरह नहीं होना चाहिए — यह जनता का पैसा है और इसका असर measurable होना चाहिए। आज जमीनी हकीकत यही है कि बड़े-बड़े बिलबोर्ड और चमकदार वीडियो के बीच गांवों में लोग योजना की बारीकियों से अनजान बैठे हैं। अगर सरकार सचमुच चाहती है कि योजनाओं का लाभ जनता तक पहुँचे, तो प्रचार की बजाए पारदर्शिता, लक्षित सूचना-संचार और असर मापने की दिशा में कदम उठाना होगा — वरना यह खर्च सिर्फ राज्यकोस की लूट होगी । 

— नागेंद्र पांडेय
संपादक, MBP

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