कहते हैं किस्मत जब मेहरबान होती है, तो छप्पर फाड़कर देती है… और इस बार किस्मत ने दरवाज़ा खटखटाया नहीं, सीधा चाबी पकड़ाकर पूरी कंपनी सौंप दी। ₹55 हजार करोड़ के कर्ज में डूबी जयप्रकाश एसोसिएट्स अब करीब ₹15 हजार करोड़ में अडानी ग्रुप की झोली में आ गिरी है।
यानी जो कंपनी कभी इंफ्रास्ट्रक्चर, सीमेंट और पावर सेक्टर में दिग्गज मानी जाती थी, वो अब ‘डिस्काउंट सेल’ में निकल गई। और ये कोई आम सेल नहीं थी—यहां खरीदार को सिर्फ कंपनी नहीं, बल्कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा में करीब 4 हजार एकड़ जमीन भी बोनस में मिल गई।
अब जरा हिसाब लगाइए… इस पूरे सौदे में जमीन की कीमत करीब ₹8 हजार प्रति वर्ग मीटर के आसपास बैठती है। वही जमीन, जिसके लिए आम आदमी लाखों रुपये प्रति मीटर खर्च करता है। ऊपर से इस जमीन का लोकेशन—जेवर एयरपोर्ट के आसपास—यानी आने वाले समय में सोने की खान।

और मज़ेदार बात ये है कि ये सिर्फ जमीन का खेल नहीं है। इसके साथ सीमेंट प्लांट, पावर सेक्टर की हिस्सेदारी और कई दूसरे एसेट्स भी पैकेज में शामिल हैं। यानी एक तिहाई में जमीन और बाकी दो तिहाई में ‘फ्री का माल’।
अब आते हैं असली पीड़ितों पर। जिन लोगों ने इस कंपनी में निवेश किया था, यानी शेयरहोल्डर्स—उनके हिस्से आया है सिर्फ सन्नाटा। ना कोई मुआवजा, ना कोई राहत… सीधे-सीधे ‘झुनझुना’ भी नहीं।
और बैंक? जिनके हजारों करोड़ फंसे हुए थे… वो भी अब लाइन में खड़े हैं, शायद इस उम्मीद में कि कुछ तो वापस मिलेगा। लेकिन हकीकत ये है कि recovery इतनी कम है कि इसे देखकर ‘घंटाघर पर घंटा बजाना’ ज्यादा सही मुहावरा लगता है।
इस पूरे खेल में सबसे दिलचस्प बात रही बोली की लड़ाई। वेदांता भी मैदान में थी, लेकिन उसकी पेमेंट शर्तें लंबी थीं। अडानी ने कम समय में पैसे देने का ऑफर दिया और बाज़ी मार ली। सिस्टम ने भी उसी को चुना जो जल्दी पैसा दे सके—चाहे कुल रकम कितनी भी हो।
अब सवाल ये नहीं है कि डील हुई या नहीं… सवाल ये है कि क्या ये वाकई एक fair deal है? क्या insolvency सिस्टम में छोटे निवेशकों की कोई जगह है? और क्या बड़े कॉरपोरेट्स के लिए ये एक नया ‘सस्ता शॉपिंग मॉल’ बन चुका है?
क्योंकि यहां कहानी साफ दिखती है—एक तरफ कंपनी सस्ते में हाथ लगी, दूसरी तरफ जमीन की कीमत भविष्य में कई गुना बढ़ने वाली है। यानी आज का खर्च, कल का मुनाफा।
बाकी… जनता देख रही है, सिस्टम चल रहा है, और ‘लॉटरी’ लगती जा रही है।






