प्रदेश में ट्रिपल इंजन की सरकार होने का दावा बार-बार किया जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि गरीबों के घर आज भी अधूरे खड़े हैं। 15 दिन में 32 हजार प्रधानमंत्री आवास पूरे करने का दावा अब खुद व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है। आखिर सिर्फ घोषणा और किस्त जारी करने से क्या मकान बन जाते हैं?
मामला जांजगीर-चांपा जिला का है, जहां प्रधानमंत्री आवास योजना की रफ्तार बेहद धीमी नजर आ रही है। चालू वित्तीय वर्ष में 1,12,452 आवास पूरे करने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन अब तक केवल 79,991 मकान ही बन पाए हैं। वित्तीय वर्ष खत्म होने में महज 15 दिन बचे हैं और 32,461 आवास अभी अधूरे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या ये लक्ष्य सिर्फ कागजों में ही पूरे दिखाए जाएंगे?
जमीनी स्तर पर हालात यह हैं कि हितग्राहियों को समय पर पूरी राशि नहीं मिल रही। जियो टैगिंग और फाइल आगे बढ़ाने के नाम पर दबाव बनाया जाता है। कई जगहों पर आरोप हैं कि आवास मित्र और रोजगार सहायकों द्वारा कमीशन मांगा जाता है। जब तक हितग्राही “सेवा शुल्क” नहीं देता, तब तक जियो टैगिंग नहीं होती और अगली किस्त अटक जाती है। नतीजा—मकान का काम बीच में रुक जाता है और गरीब परिवार अधूरे घर के साथ इंतजार करता रह जाता है।
ट्रिपल इंजन की सरकार के दावों के बीच यह सवाल और भी बड़ा हो जाता है कि आखिर जिम्मेदारी किसकी है? अगर योजना प्रधानमंत्री की फ्लैगशिप है, तो जमीन पर इसकी रफ्तार इतनी धीमी क्यों है? क्या प्रशासनिक सुस्ती और सिस्टम में फैली लापरवाही पर कोई कार्रवाई होगी, या फिर हर बार की तरह आंकड़ों में ही लक्ष्य पूरे कर दिए जाएंगे?
आखिर कब तक गरीब का घर राजनीति और दावों के बीच फंसा रहेगा?







