रायपुर। छत्तीसगढ़ की जेलों से सामने आए ताज़ा आंकड़े एक गंभीर स्थिति की ओर इशारा कर रहे हैं। जनवरी 2025 से जनवरी 2026 के बीच राज्य की विभिन्न जेलों में 66 बंदियों की मौत दर्ज की गई है। यानी औसतन हर महीने करीब 5 से 6 कैदियों की जान जेल के भीतर चली गई। इसे दिनों में समझें तो लगभग हर छह दिन में एक बंदी की मौत हो रही है।
यह आंकड़े सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा हैं, लेकिन सवाल यह है कि आखिर जेलों के भीतर ऐसी परिस्थितियां क्यों बन रही हैं?
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग) के दिशा-निर्देशों के तहत जेल में होने वाली प्रत्येक मौत की जांच अनिवार्य होती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 66 में से 18 मामलों में न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा जांच पूरी कर ली गई है, जबकि शेष 48 मामलों में जांच प्रक्रिया अभी जारी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जेलों में भीड़भाड़ एक बड़ी समस्या है। वर्तमान में छत्तीसगढ़ की जेलों में निर्धारित क्षमता से लगभग 150 प्रतिशत अधिक कैदी बंद हैं। ऐसे में संसाधनों की कमी, स्वास्थ्य सुविधाओं पर दबाव और प्रशासनिक चुनौतियां गंभीर रूप ले सकती हैं।
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि केवल आंकड़ों से आगे बढ़कर मौतों के कारणों की पारदर्शी जांच और सुधारात्मक कदम उठाना जरूरी है। सवाल सिर्फ संख्या का नहीं, बल्कि उन 66 ज़िंदगियों का है जो न्यायिक हिरासत के दौरान खत्म हो गईं।
राज्य सरकार और जेल प्रशासन के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे जेल सुधार, स्वास्थ्य व्यवस्था और भीड़ नियंत्रण को प्राथमिकता दें ताकि भविष्य में ऐसे आंकड़े दोहराए न जाएं।







