मध्यप्रदेश को 50 हज़ार करोड़ का नुकसान, ‘डबल इंजन’ बना डबल संकट: कमलनाथ

Madhya Bharat Desk
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भोपाल।मध्य प्रदेश की राजनीति में वित्तीय संकट को लेकर घमासान तेज हो गया है। पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने केंद्र और राज्य की भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि “डबल इंजन की सरकार अब मध्य प्रदेश के लिए डबल संकट बन चुकी है।”

कमलनाथ ने आरोप लगाया कि जब केंद्र और राज्य दोनों जगह भाजपा की सरकार है, तब प्रदेश को अधिक आर्थिक सहयोग मिलना चाहिए था। लेकिन हकीकत इसके उलट दिखाई दे रही है। केंद्रीय करों में मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी घटा दी गई है, जिससे अगले पांच वर्षों में प्रदेश को लगभग 50,000 करोड़ रुपये कम मिलेंगे।

 16वें वित्त आयोग का नया फार्मूला और बड़ा असर

दरअसल, की सिफारिशों के तहत 2026 से 2031 तक केंद्रीय करों के बंटवारे का नया फार्मूला लागू होगा। इस नए फॉर्मूले में उन राज्यों को अधिक लाभ मिलेगा जो राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में ज्यादा योगदान दे रहे हैं।

मध्य प्रदेश इस पैमाने पर पिछड़ गया है। पहले केंद्रीय करों में प्रदेश की हिस्सेदारी 7.85% थी, जो घटकर 7.35% रह गई है। यह 0.50% की कमी आने वाले वर्षों में बड़ा वित्तीय अंतर पैदा करेगी।

 कटौती का गणित

आंकड़ों के अनुसार:

  • 2026-27 में प्रदेश को लगभग 7,677 करोड़ रुपये कम मिलेंगे
  • 2030-31 तक यह वार्षिक कमी बढ़कर 12,964 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है
  • कुल मिलाकर पांच साल में लगभग 50,000 करोड़ रुपये की कमी का अनुमान है

बजट से पहले बड़ा झटका

मध्य प्रदेश सरकार 18 फरवरी को अपना बजट पेश करने जा रही है। उससे पहले यह कटौती सरकार के लिए बड़ा आर्थिक झटका मानी जा रही है। पहले उम्मीद थी कि केंद्रीय करों में हिस्सेदारी बढ़ेगी, लेकिन उल्टा हुआ।

 कर्ज पहले से ज्यादा

कमलनाथ ने यह भी कहा कि प्रदेश की वित्तीय स्थिति पहले ही चिंताजनक है। राज्य पर कर्ज का बोझ उसके सालाना बजट से अधिक हो चुका है। ऐसे में घटती आय का सीधा असर विकास योजनाओं और जनकल्याणकारी योजनाओं पर पड़ सकता है।

 किन राज्यों को फायदा?

नए फॉर्मूले से कर्नाटक को सबसे अधिक लाभ मिला है। इसके अलावा केरल, गुजरात, हरियाणा और महाराष्ट्र को भी अतिरिक्त हिस्सेदारी मिलेगी।

वहीं मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों को कटौती का सामना करना पड़ेगा।

 विकास के दावे पर सवाल

राज्य सरकार ने वित्त आयोग को दी गई अपनी रिपोर्ट में कृषि, बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य और वन संरक्षण में प्रगति का हवाला दिया था। साथ ही यह तर्क दिया था कि राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ाना न्यायसंगत होगा। लेकिन आयोग की सिफारिशें इसके विपरीत रहीं।

अब राजनीतिक सवाल यही है — क्या यह वित्तीय पुनर्संतुलन है या फिर मध्य प्रदेश के लिए आर्थिक संकट की नई शुरुआत?

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