नई दिल्ली।लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के भाषण एक बार फिर चर्चा में हैं। लेकिन इस बार मुद्दा उनके विचार नहीं, बल्कि उन विचारों को प्रस्तुत करने के तरीके को लेकर है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या उनके अंग्रेज़ी भाषणों को समझने की कोशिश की जाती है, या फिर उन्हें सिर्फ सोशल मीडिया पर ट्रोल करने का माध्यम बना दिया जाता है?
राजनीति में असहमति स्वाभाविक है। आलोचना भी लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन जब किसी नेता के भाषण को उसकी मूल भावना में समझने के बजाय, केवल क्लिपिंग्स निकालकर मज़ाक या कटाक्ष का विषय बना दिया जाए, तो बहस की दिशा बदल जाती है।
पत्रकारिता के पाठ्यक्रम में ‘ट्रांसलेशन’ यानी अनुवाद एक महत्वपूर्ण विषय है। इसका उद्देश्य यही है कि किसी भी भाषा में दिए गए वक्तव्य को दूसरी भाषा के पाठकों तक सही संदर्भ और अर्थ के साथ पहुँचाया जाए। लेकिन मौजूदा दौर में यह जिम्मेदारी कई बार ‘ट्रोलिंग’ के शोर में दबती नजर आती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र में भाषण का मूल्य उसकी भाषा से नहीं, बल्कि उसके विचारों से तय होना चाहिए। यदि कोई नेता अंग्रेज़ी में बोलता है, तो उसे हिंदी या अन्य भाषाओं में सटीक रूप से अनुवादित कर जनता के सामने रखना मीडिया की जिम्मेदारी है।
राजनीतिक संवाद का स्तर तभी बेहतर होगा जब बहस मुद्दों पर होगी, न कि उच्चारण या भाषा पर। सवाल यह नहीं कि भाषण अंग्रेज़ी में क्यों है, बल्कि यह कि उसमें कहा क्या गया है।
आज की डिजिटल राजनीति में ट्रोलिंग तेज़ है, लेकिन पत्रकारिता की असली ताकत अब भी तथ्य, संदर्भ और संतुलन में ही है।







