बैलाडीला की पहाड़ियों में तेज़ी से फैल रही खनन गतिविधियां अब बाघों के अस्तित्व के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही हैं। जंगलों के लगातार कटने और खनन से पैदा हो रहे शोर व कंपन के चलते बाघ अपने प्राकृतिक रास्ते और आवास बदलने को मजबूर हो रहे हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि अब ये वन्यजीव मानव बस्तियों की ओर रुख करने लगे हैं।
बीते दो दिनों में बचेली–भांसी रेलवे ट्रैक के आसपास बाघ की मौजूदगी दर्ज की गई है। इसके अलावा भांसी क्षेत्र में एक मवेशी के शिकार की घटना सामने आने के बाद ग्रामीणों में भय का माहौल है। हालात को देखते हुए वन विभाग ने गांवों में मुनादी कर लोगों को सतर्क किया है। ग्रामीणों को रात के समय घर से बाहर न निकलने और सुबह पांच से सात बजे के बीच जंगल की ओर न जाने की सख्त सलाह दी गई है। साथ ही रेलवे प्रशासन को भी बचेली से भांसी और आगे के सेक्शन में ट्रेनों की गति सीमित रखने का आग्रह किया गया है।
हर साल तय समय पर दिख रहे बाघ
वन विभाग के सूत्रों के मुताबिक, बैलाडीला माइनिंग क्षेत्र के जंगलों में अक्टूबर–नवंबर के दौरान बाघों की मौजूदगी पिछले कई वर्षों से दर्ज होती रही है। मानसून के बाद इंद्रावती नदी का जलस्तर घटने पर बाघ इस इलाके की ओर विचरण करते हैं। इसके पीछे मुख्य रूप से दो कारण माने जा रहे हैं—पहला प्रजनन के लिए मादा की तलाश और दूसरा अपने क्षेत्र का विस्तार।
संख्या बढ़ी, लेकिन खतरा बरकरार
छत्तीसगढ़ में बीते एक दशक के दौरान बाघों की संख्या में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। वर्ष 2019 में इनकी संख्या घटकर 22 रह गई थी, जबकि 2018 में यह 46 थी। वर्तमान विभागीय आकलन के अनुसार राज्य में बाघों की संख्या 50 से अधिक बताई जा रही है। अचानकमार टाइगर रिजर्व में 30 से ज्यादा बाघ हैं, इंद्रावती टाइगर रिजर्व में इनकी संख्या 10 से ऊपर है, जबकि सीतानदी–उदंती क्षेत्र में लगभग तीन बाघों की मौजूदगी का अनुमान है।
हाल ही में 25 जनवरी को पूरे देश में कराए गए ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन सर्वे की प्रक्रिया पूरी हुई है। रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं हुई है, लेकिन सूत्रों का दावा है कि नए आंकड़ों में भी छत्तीसगढ़ में बाघों की संख्या 50 से अधिक सामने आएगी।
राजा बंगला: आदर्श आवास, लेकिन बढ़ता खतरा
वन विभाग का कहना है कि बचेली का राजा बंगला क्षेत्र बाघों के लिए एक आदर्श प्राकृतिक आवास माना जाता है। यहां घास के बड़े मैदान हैं और चीतल, हिरण, सांभर व जंगली सुअर जैसे शिकार प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। लेकिन इसी क्षेत्र में बढ़ती माइनिंग गतिविधियां इस प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ रही हैं। लगातार हो रही ब्लास्टिंग से बाघ विचलित हो रहे हैं और वे जंगल छोड़कर गांवों की ओर बढ़ने लगे हैं।
यदि खनन की यही रफ्तार बनी रही, तो आने वाले समय में बैलाडीला क्षेत्र में बाघों की संख्या में गिरावट से इनकार नहीं किया जा सकता।







