फरसाबहार।प्रदेश सरकार जहां “सुशासन” और बेहतर शिक्षा व्यवस्था के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं जशपुर जिले जो खुद मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का गृहजिला है यहां के फरसाबहार विकासखंड की हकीकत इन दावों की पोल खोल रही है। विकासखंड के 17 प्राथमिक और 3 माध्यमिक विद्यालय आज भी जर्जर भवनों के कारण महज एक अतिरिक्त कक्ष में संचालित हो रहे हैं। आठ बाय दस फीट के छोटे कमरे में पहली से पांचवीं तक के बच्चे एक साथ पढ़ने को मजबूर हैं, जबकि उसी कमरे में स्कूल का कार्यालय भी संचालित हो रहा है।
ग्रामीणों का आरोप है कि सुशासन तिहार के दौरान अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने स्कूल भवन निर्माण का आश्वासन तो दिया, लेकिन एक शिक्षा सत्र बीत जाने के बाद भी धरातल पर कोई काम शुरू नहीं हुआ। मुख्यमंत्री अपने ही गृहजिला के लोगो को झूठा आश्वासन दे रहे है। इससे अभिभावकों में सरकार और प्रशासन के प्रति नाराजगी बढ़ती जा रही है।
एक कमरे में पांच कक्षाएं, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित
प्राथमिक शाला बथानटोली में पहली से पांचवीं तक कुल 23 विद्यार्थी दर्ज हैं। स्कूल में दो शिक्षिकाएं पदस्थ हैं, लेकिन एक छोटे से कमरे में सभी कक्षाओं को एक साथ पढ़ाना संभव नहीं है। स्थिति ऐसी है कि जिस दिन पहली और दूसरी कक्षा की पढ़ाई होती है, उस दिन तीसरी, चौथी और पांचवीं के बच्चे खाली बैठे रहते हैं। वहीं तीसरी और चौथी की पढ़ाई होने पर पहली, दूसरी और पांचवीं के बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है।
कमरे के एक हिस्से में टेबल, कुर्सी, अलमारी, स्टेशनरी और खेल सामग्री रखी गई है, जबकि शेष जगह में बच्चे भेड़-बकरियों की तरह बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं।
दलेसर स्कूल में दो शिक्षक, लेकिन एक ही पढ़ा सकता है
प्राथमिक शाला लालगोड़ा (दलेसर) की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। यहां पहली से पांचवीं तक के 18 बच्चों को एक ही कमरे में बैठाया जाता है। दो शिक्षक होने के बावजूद एक समय में केवल एक शिक्षक ही पढ़ा सकता है। शिक्षक बच्चों की कतार देखकर पहचानते हैं कि कौन किस कक्षा का विद्यार्थी है।
स्थिति इतनी गंभीर है कि पांचवीं के विद्यार्थियों को पहली कक्षा का “अनार-आम” पढ़ना पड़ता है, जबकि पहली के बच्चे पांचवीं के गणित के सवाल सुनते रहते हैं।
सुशासन तिहार में मिला था आश्वासन, आज तक नहीं बना भवन
ग्रामीणों ने बताया कि 7 मार्च 2025 को कोल्हेंझरिया में आयोजित विकासखंड स्तरीय सुशासन तिहार में कलेक्टर को लिखित आवेदन देकर स्कूल भवन की जर्जर स्थिति से अवगत कराया गया था। उस समय डीएमएफ मद से भवन निर्माण अथवा मरम्मत कराने का आश्वासन दिया गया था।
आश्वासन मिलने के बाद ग्रामीणों और अभिभावकों को उम्मीद थी कि बच्चों को जल्द सुरक्षित भवन मिलेगा, लेकिन एक पूरा शिक्षा सत्र समाप्त हो गया और नया सत्र शुरू हुए भी लगभग एक माह बीत चुका है, फिर भी निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ।
जर्जर भवन बने हादसे का इंतजार
जिन स्कूलों का संचालन अतिरिक्त कक्षों में हो रहा है, उनके पुराने भवन पूरी तरह जर्जर हो चुके हैं। छतों का पलस्तर उखड़ चुका है, बरसात में पानी टपकता है और दीवारों में गहरी दरारें पड़ चुकी हैं। भवन कभी भी गिर सकता है। इसी खतरे को देखते हुए शिक्षकों ने पुराने भवनों में पढ़ाई बंद कर दी है, लेकिन नए भवनों का निर्माण अब तक नहीं हो सका।
ग्रामीणों में आक्रोश
ग्रामीणों का कहना है कि जनप्रतिनिधि पुल, पुलिया, सीसी सड़क और अन्य निर्माण कार्यों को प्राथमिकता देते हैं, लेकिन सरकारी स्कूलों की बदहाली और बच्चों की सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। उनका सवाल है कि जब सरकार शिक्षा को प्राथमिकता देने का दावा करती है, तो आखिर मासूम बच्चों को ऐसी परिस्थितियों में पढ़ने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ रहा है।
बड़ा सवाल यह है कि क्या सुशासन केवल मंचों और भाषणों तक सीमित है, या फिर गांव के बच्चों को भी सुरक्षित और सम्मानजनक शिक्षा का अधिकार मिलेगा?





