पूर्व मुख्यमंत्री और विधायक कमलनाथ ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में न्यायपालिका वह आखिरी स्तंभ होती है, जिस पर आम नागरिक सत्ता के अन्याय के खिलाफ भरोसा करता है। लेकिन जब उसी न्यायपालिका की संरचना पर पक्षपात के संदेह गहराने लगें, तो लोकतांत्रिक मूल्यों को गंभीर क्षति पहुंचती है।
कमलनाथ ने कहा कि न्याय केवल किया जाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका निष्पक्ष दिखाई देना भी उतना ही जरूरी है। हालिया आंकड़े यह दर्शाते हैं कि मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में नियुक्त न्यायाधीशों का बड़ा हिस्सा पहले सरकार की ओर से पैरवी कर चुका है। यह स्थिति आम जनता के मन में स्वाभाविक रूप से संदेह पैदा करती है कि क्या सत्ता से जुड़े मामलों में अदालतें पूरी तरह स्वतंत्र रह पाएंगी।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में इस समय कुल 42 न्यायाधीश पदस्थ हैं। इनमें से 26 न्यायाधीशों की नियुक्ति वकील कोटे से हुई है। इन 26 में से 3 न्यायाधीश अन्य हाईकोर्ट से ट्रांसफर होकर आए हैं। यानी वर्तमान में हाईकोर्ट में 23 ऐसे न्यायाधीश हैं, जिन्होंने यहीं वकालत की है।
इन 23 में से 18 न्यायाधीश ऐसे हैं, जो जज बनने से पहले मध्यप्रदेश या केंद्र सरकार की ओर से वकील के रूप में पेश हो चुके हैं। कुछ मामलों में तो नियुक्ति के समय भी वे सरकार का पक्ष रख रहे थे। इस तरह मौजूदा हाईकोर्ट के करीब 43 प्रतिशत न्यायाधीश ऐसे हैं, जिनकी पहचान पूर्व में सरकार के पैरोकार के रूप में रही है।
कमलनाथ ने स्पष्ट किया कि यह किसी न्यायाधीश की व्यक्तिगत ईमानदारी या योग्यता पर प्रश्न नहीं है, बल्कि पूरी नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता और संतुलन पर चिंता है। न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच संवैधानिक दूरी लोकतंत्र की बुनियाद होती है। अगर यह दूरी सिमटती है, तो अदालतें सत्ता पर अंकुश लगाने के बजाय, उसके निर्णयों को वैधता देने वाली संस्था बनती नजर आने लगती हैं।
उन्होंने कहा कि इसका सबसे बड़ा नुकसान जनता के विश्वास को होता है। जब आम नागरिक को यह महसूस होने लगे कि न्यायिक संस्थाएं भी सत्ता के प्रभाव से मुक्त नहीं हैं, तो न्याय प्रणाली के प्रति निराशा बढ़ती है। यही निराशा धीरे-धीरे लोकतंत्र को अंदर से कमजोर कर देती है।
कमलनाथ ने न्यायिक नियुक्तियों में अधिक पारदर्शिता, विविध पृष्ठभूमि और संतुलन की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि यदि समय रहते इस प्रवृत्ति पर आत्ममंथन नहीं किया गया, तो अदालतों के फैसले भले ही कानूनी रूप से सही हों, लेकिन जनता की नजर में उनकी विश्वसनीयता लगातार घटती चली जाएगी।







