कंचना यादव की ज़हरबूझी क्लिप कोई अचानक हुई चूक नहीं है। यह उस वैचारिक प्रयोगशाला का नतीजा है, जो सालों से देश के विश्वविद्यालय परिसरों में निर्बाध चल रही है। जब ऐसी क्लिप का हवाला सुप्रीम कोर्ट में दिया जाता है और उसके बाद UGC मामले में अंतरिम राहत मिलती है, तो बहस नियमों से आगे बढ़कर सोच की दिशा पर आ टिकती है।
समस्या सिर्फ़ छात्र राजनीति की नहीं है। समस्या तब गंभीर हो जाती है, जब न्यायपालिका और अकादमिक ढांचे के भीतर वैचारिक पक्षपात के उदाहरण सामने आते हैं
ऐसे में सवाल उठता है कि यदि इसी मानसिकता वाले लोग आज UGC जैसे संवेदनशील मामलों का फैसला करें, तो परिणाम क्या होगा? स्थगनादेश या स्थायी शिकंजा? यह आशंका नहीं, हालात का तार्किक निष्कर्ष है।
विश्वविद्यालयों को विचार और बहस का केंद्र होना चाहिए था, लेकिन वे धीरे-धीरे जातीय उकसावे, राष्ट्रविरोधी नैरेटिव और चयनित आक्रोश की नर्सरी बनते चले गए। वहीं से जेएनयू से कंचना यादव, कन्हैया कुमार और शारजील इमाम जैसे नाम उभरते हैं। ये व्यक्तिगत दुर्घटनाएँ नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रही बौद्धिक ट्रेनिंग का परिणाम हैं।
सबसे असहज प्रश्न सत्ता से है।
1998 से 2026 के बीच 28 वर्षों में 18 साल केंद्र में सरकार रही, लेकिन न तो इतिहास लेखन बदला गया, न ही पाठ्यक्रमों की वैचारिक सफ़ाई हुई। शिक्षा की चाबी उन्हीं हाथों में बनी रही, जो इस वैचारिक ज़हर को छूना भी पाप मानते थे।
UGC का विवाद असल में रेगुलेशन का नहीं है।
यह तय करने की लड़ाई है कि देश की अगली पीढ़ी तथ्यों से बनेगी या ज़हर से। अगर अब भी इन वैचारिक फैक्ट्रियों पर सवाल नहीं उठे, तो कल कंचना यादव जैसे नाम अपवाद नहीं रहेंगे ,वे नई सामान्यता बन जाएंगे



