लापरवाही की कीमत: अचानकमार में बाघ की मौत, प्रबंधन पर उठे सवाल

Madhya Bharat Desk
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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के प्रमुख वन्यजीव अभयारण्यों में शामिल अचानकमार टाइगर रिजर्व में एक बाघ की मौत ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिजर्व क्षेत्र के भीतर एक बाघ का करीब 5 से 6 दिन पुराना शव मिलने से यह स्पष्ट हो गया है कि सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था में भारी चूक हुई है। जिस टाइगर रिजर्व को पैदल पेट्रोलिंग और स्मार्ट मॉनिटरिंग में प्रदेश में अव्वल बताया जाता रहा है, वहां इतने दिनों तक शव का न मिलना दावों और हकीकत के बीच बड़ा अंतर दिखाता है।

शव की हालत देखकर विशेषज्ञों का मानना है कि संबंधित क्षेत्र में लंबे समय से प्रभावी गश्त नहीं की गई। यदि नियमित पेट्रोलिंग, कैमरा ट्रैप और ट्रैकिंग सिस्टम सही ढंग से काम कर रहे होते, तो बाघ की गतिविधि रुकने की जानकारी समय रहते मिल सकती थी। इतने लंबे अंतराल के बाद शव मिलने से अब मौत के वास्तविक कारणों का पता लगाना भी एक चुनौती बन गया है।

हाल के महीनों में मध्य प्रदेश से आए बाघों के कारण अचानकमार में बाघों की संख्या बढ़ने से संरक्षण को लेकर नई उम्मीदें जगी थीं। वन्यजीव प्रेमियों और संरक्षणवादियों को लगने लगा था कि यह रिजर्व एक बार फिर बाघों का सुरक्षित ठिकाना बन सकता है, लेकिन इस घटना ने उन उम्मीदों को गहरा झटका दिया है। कई लोगों का कहना है कि यदि प्रबंधन इसी तरह लापरवाह रहा, तो बाघों की सुरक्षा केवल कागजी दावा बनकर रह जाएगी।

इस पूरे मामले को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या बाघ की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई या इसके पीछे शिकार जैसी किसी गतिविधि की आशंका है? गश्ती दल इतने दिनों तक इस घटना से अनजान कैसे रहा? क्या पेट्रोलिंग और निगरानी सिर्फ फाइलों तक सीमित रह गई है? इन सवालों ने वन विभाग की जवाबदेही पर सीधा सवाल खड़ा कर दिया है।

घटना की जानकारी मिलने के बाद वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर निरीक्षण किया है। विभाग का कहना है कि शव का पोस्टमार्टम कराया जा रहा है और मामले की गहन जांच शुरू कर दी गई है। मौत के कारणों का खुलासा जांच रिपोर्ट आने के बाद किया जाएगा। हालांकि, इस घटना ने यह साफ कर दिया है कि केवल रैंकिंग और आंकड़ों के आधार पर खुद को बेहतर बताना वन्यजीवों की सुरक्षा की गारंटी नहीं हो सकता।

अचानकमार टाइगर रिजर्व में हुई यह घटना राज्य सरकार और वन विभाग दोनों के लिए एक चेतावनी है कि यदि जमीनी स्तर पर निगरानी और जवाबदेही नहीं बढ़ाई गई, तो संरक्षण के सारे दावे खोखले साबित होंगे।

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