रायगढ़।रायगढ़ एक बार फिर पर्यावरण और औद्योगिक विस्तार की बड़ी बहस के बीच खड़ा है। अडानी पावर लिमिटेड अपने मौजूदा 2200 मेगावाट ताप विद्युत संयंत्र में 1600 मेगावाट (2×800 मेगावाट) का विस्तार करना चाहती है। इसके बाद संयंत्र की कुल क्षमता बढ़कर 3800 मेगावाट हो जाएगी। कंपनी ने इसके लिए पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया के तहत जनसुनवाई का रास्ता अपनाया है। परियोजना के दस्तावेजों में आधुनिक तकनीक, 100 प्रतिशत फ्लाई ऐश उपयोग और पर्यावरण संरक्षण जैसे कई दावे किए गए हैं, लेकिन रायगढ़ की जमीनी हकीकत इन दावों पर सवाल खड़े करती है।
सबसे खास बात यह है कि कंपनी ने अपने पर्यावरणीय दस्तावेजों में ऐसे राष्ट्रीय आंकड़े भी दिए हैं, जो कई नए सवाल पैदा करते हैं। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के मुताबिक वर्ष 2025 तक देश की स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता करीब 4.62 लाख मेगावाट पहुंच चुकी है। वहीं ऑल इंडिया पीक डिफिसिट और एनर्जी डिफिसिट के आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में बिजली की कमी लगभग खत्म हो चुकी है। यानी जिस बिजली संकट का हवाला पहले दिया जाता था, वह अब पहले जैसा नहीं रहा।
यहीं से रायगढ़ के लोगों का सबसे बड़ा सवाल शुरू होता है। जब देश में बिजली की कमी लगभग नहीं है और उत्पादन क्षमता लगातार बढ़ रही है, तो फिर रायगढ़ की हवा, पानी, जंगल और खेती की कीमत पर 1600 मेगावाट का एक और कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र बढ़ाने की जरूरत आखिर क्यों है?
कंपनी के दस्तावेज बताते हैं कि विस्तार के बाद हर साल 16.52 मिलियन टन कोयले की जरूरत होगी। इसके लिए 82 एमसीएम पानी लगेगा और करीब 6.298 मिलियन टन फ्लाई ऐश व बॉटम ऐश निकलेगी। कागजों में यह भी दावा किया गया है कि फ्लाई ऐश का 100 प्रतिशत उपयोग किया जाएगा। लेकिन रायगढ़ में सड़कों, खेतों, जंगलों, नालों और नदी किनारे फैली फ्लाई ऐश आज भी इस दावे पर सवाल खड़े करती है।
रायगढ़ के ग्रामीण इलाकों में यह कोई नई समस्या नहीं है। बरसात में फ्लाई ऐश खेतों तक पहुंच जाती है। नालों और जल स्रोतों में राख की परतें साफ दिखाई देती हैं। कई किसानों का कहना है कि इससे मिट्टी की उर्वरता प्रभावित हुई है और फसल उत्पादन भी घटा है। धूल के साथ उड़ती राख लोगों के घरों तक पहुंचती है। सांस, आंख और त्वचा से जुड़ी दिक्कतें भी लंबे समय से लोगों की चिंता बनी हुई हैं। ऐसे में नए विस्तार से पहले पुराने वादों का हिसाब मांगना लोगों के लिए स्वाभाविक है।
पर्यावरणीय दस्तावेज में यह भी बताया गया है कि देश की कुल स्थापित बिजली क्षमता में कोयला आधारित संयंत्रों की हिस्सेदारी करीब 46 प्रतिशत है, जबकि नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। ऐसे समय में जब दुनिया कार्बन उत्सर्जन कम करने और स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रही है, रायगढ़ में कोयला आधारित बिजली उत्पादन बढ़ाने का फैसला पर्यावरण के लिहाज से गंभीर चर्चा का विषय बन गया है।
दस्तावेजों के मुताबिक इस विस्तार के लिए अतिरिक्त 185 हेक्टेयर भूमि का उपयोग किया जाएगा। महानदी से और पानी लिया जाएगा तथा लाखों टन अतिरिक्त कोयले का परिवहन होगा। यानी ट्रकों की आवाजाही, कोयले की धूल, राख और औद्योगिक गतिविधियां भी बढ़ेंगी। स्थानीय लोगों का कहना है कि इसका सीधा असर आसपास के गांवों, खेती और हवा की गुणवत्ता पर पड़ेगा।
अडानी के लिए आसान नहीं होंगे ये सवाल
इस बार जनसुनवाई में सिर्फ परियोजना का प्रस्तुतीकरण काफी नहीं होगा। लोगों की नजर उन सवालों पर होगी, जिनके जवाब उन्हें वर्षों से नहीं मिले हैं।
जब कंपनी खुद कह रही है कि देश में बिजली की कमी लगभग खत्म हो चुकी है, तो रायगढ़ को ही अतिरिक्त प्रदूषण का बोझ क्यों उठाना पड़े? यदि फ्लाई ऐश का 100 प्रतिशत उपयोग हो रहा है, तो जिले के कई इलाकों में खुले में पड़े राख के ढेर आखिर किसके हैं?
जब मौजूदा संयंत्रों से प्रदूषण को लेकर शिकायतें आज भी जारी हैं, तो हर साल निकलने वाली 6.298 मिलियन टन राख का सुरक्षित प्रबंधन किस भरोसे पर होगा? क्या विस्तार की मंजूरी से पहले वर्तमान संयंत्र के पर्यावरणीय पालन, फ्लाई ऐश प्रबंधन, वायु गुणवत्ता और जल स्रोतों पर पड़े असर का स्वतंत्र और सार्वजनिक ऑडिट कराया जाएगा?
और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या विकास का पूरा बोझ सिर्फ रायगढ़ की हवा, पानी, जंगल और किसानों की जमीन ही उठाएगी, जबकि बिजली का फायदा पूरे देश को मिलेगा?
दरअसल, रायगढ़ की यह जनसुनवाई सिर्फ एक उद्योग की मंजूरी का मामला नहीं है। यह उस विकास मॉडल की परीक्षा भी है, जहां उद्योगों के दावे और जमीनी सच्चाई आमने-सामने खड़ी हैं। अब लोग सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि पुराने वादों का हिसाब और भविष्य की जवाबदेही भी चाहते हैं। यही इस जनसुनवाई का सबसे बड़ा मुद्दा बनने वाला है।






