नई दिल्ली: कांग्रेस की वैचारिक रीढ़ मानी जाने वाली भारतीय युवक कांग्रेस (IYC) इन दिनों अपने ही कार्यकर्ताओं के सवालों के घेरे में है। कभी सड़कों पर संघर्ष और आंदोलनों की पहचान रखने वाला यह संगठन अब अपनी कार्यशैली को लेकर आलोचनाओं का सामना कर रहा है। आरोप है कि युवक कांग्रेस धीरे-धीरे जमीनी राजनीति से दूर होकर ‘कॉरपोरेट वर्किंग कल्चर’ की ओर बढ़ती जा रही है।
रविवार की छुट्टी और सवालों के ताले
राजनीति में रविवार आमतौर पर बैठकों, रणनीति और कार्यकर्ताओं से संवाद का दिन माना जाता है, लेकिन हाल के दिनों में युवक कांग्रेस के राष्ट्रीय कार्यालय में रविवार को पसरा सन्नाटा कई सवाल खड़े कर रहा है। दफ्तर पर लगे ताले यह संकेत दे रहे हैं कि संगठन की सक्रियता अब सीमित होती जा रही है।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब सत्तारूढ़ और विपक्षी दल चौबीसों घंटे राजनीति में सक्रिय रहते हैं, तब युवा कांग्रेस का मुख्यालय छुट्टी मनाता नजर आता है।
कार्यकारिणी बड़ी, मौजूदगी कमजोर
सूत्रों के अनुसार, युवक कांग्रेस की मौजूदा राष्ट्रीय कार्यकारिणी आकार में काफी बड़ी है। राजनीतिक जानकारों का दावा है कि यदि सभी पदाधिकारी एक दिन भी कार्यालय में उपस्थित हो जाएं, तो जगह कम पड़ जाए।
लेकिन वास्तविकता इससे उलट बताई जा रही है। आरोप है कि पद तो बांटे गए हैं, पर जिम्मेदारी, नियमित उपस्थिति और जवाबदेही का अभाव साफ दिखाई देता है।
सड़क से स्क्रीन तक सिमटी राजनीति
वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं और पुराने कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर नाराजगी है कि संगठन का फोकस अब आंदोलनों से ज्यादा सोशल मीडिया तक सीमित हो गया है।
उनका कहना है कि—
- संघर्ष अब धरना-प्रदर्शन की जगह डिजिटल पोस्ट और हैशटैग तक सिमट गया है।
- बैठकों का उद्देश्य संवाद कम और औपचारिकता ज्यादा रह गया है।
- आम कार्यकर्ता को नेतृत्व तक पहुंचने के लिए लंबी और ‘कॉरपोरेट जैसी’ प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा,
“जब संगठन का मुख्यालय ही कार्यकर्ताओं के लिए बंद रहेगा, तो आने वाली राजनीतिक लड़ाइयों के लिए मजबूत कैडर कैसे तैयार होगा?”
आगे की राह
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि युवक कांग्रेस अपनी पारंपरिक आंदोलनकारी भूमिका में वापसी नहीं करती, तो इसका असर कांग्रेस के भविष्य और चुनावी ताकत पर पड़ सकता है। युवा इकाई को ही पार्टी की नेतृत्व नर्सरी माना जाता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राहुल गांधी के ‘युवा विजन’ को जमीन पर उतारा जाएगा, या युवक कांग्रेस फाइलों और डिजिटल राजनीति तक ही सीमित रह जाएगी?







