लोकतंत्र में जनता जिन प्रतिनिधियों को कानून बनाने की जिम्मेदारी देती है, अगर वही प्रतिनिधि खुद कानून के दायरे में सवालों के घेरे में हों, तो यह स्थिति स्वाभाविक रूप से चिंता पैदा करती है। केरल विधानसभा से जुड़ी एक हालिया रिपोर्ट ने इसी असहज सच्चाई को सामने रखा है।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और केरल इलेक्शन वॉच द्वारा किए गए विश्लेषण में राज्य के 132 विधायकों के हलफनामों को खंगाला गया। इस अध्ययन में यह सामने आया कि लगभग 70 प्रतिशत विधायक किसी न किसी आपराधिक मामले में शामिल हैं।
इनमें से कई मामलों की प्रकृति गंभीर है, जिनमें हत्या, हत्या का प्रयास और महिलाओं के खिलाफ अपराध भी शामिल हैं। यह केवल आंकड़ों की बात नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक व्यवस्था के उस पक्ष को दिखाता है, जहां जनप्रतिनिधियों की छवि और जिम्मेदारी के बीच स्पष्ट विरोधाभास नजर आता है।
राजनीतिक दलों के स्तर पर स्थिति और भी दिलचस्प हो जाती है, क्योंकि लगभग सभी प्रमुख पार्टियों में आपराधिक मामलों वाले विधायकों की संख्या काफी अधिक है। इसे निम्न तालिका में समझा जा सकता है:
| पार्टी का नाम | कुल विधायक | आपराधिक मामलों वाले विधायक (%) |
|---|---|---|
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) | 58 | 74% |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | 21 | 90% |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी | — | 86% |
| इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग | — | 44% |
आर्थिक स्थिति की बात करें तो तस्वीर यहां भी कम चौंकाने वाली नहीं है। कुल 132 विधायकों में से 72 विधायक करोड़पति हैं। सभी विधायकों की कुल संपत्ति 363.78 करोड़ रुपये दर्ज की गई है, जिससे औसतन प्रति विधायक संपत्ति 2.75 करोड़ रुपये बैठती है।
कुछ दलों में तो सभी विधायक करोड़पति हैं, जिससे राजनीति और आर्थिक स्थिति के बीच गहरा संबंध साफ झलकता है। इसे नीचे दी गई तालिका में देखा जा सकता है:
| पार्टी का नाम | 1 करोड़ से अधिक संपत्ति वाले विधायक (%) |
|---|---|
| केरल कांग्रेस (एम) | 100% |
| जेडी(एस) | 100% |
| राकांपा | 100% |
| केरल कांग्रेस | 100% |
| आईयूएमएल | 86% |
| कांग्रेस | 62% |
| सीपीआई (एम) | 40% |
रिपोर्ट में व्यक्तिगत स्तर पर भी दिलचस्प अंतर सामने आया है। कांग्रेस के विधायक मैथ्यू कुझलनंदन सबसे अमीर हैं, जिनकी संपत्ति 34 करोड़ रुपये से अधिक है। वहीं दूसरी ओर CPI(M) के विधायक पी.पी. सुमोद ने सबसे कम संपत्ति, लगभग 9.9 लाख रुपये घोषित की है। यह अंतर राजनीतिक वर्ग के भीतर आर्थिक असमानता को भी दर्शाता है।
शैक्षणिक और सामाजिक प्रोफाइल की बात करें तो अधिकांश विधायक शिक्षित हैं, लेकिन महिला प्रतिनिधित्व बेहद सीमित है। केवल 8 प्रतिशत महिला विधायक होना इस बात की ओर इशारा करता है कि राजनीतिक भागीदारी में लैंगिक संतुलन अभी भी दूर की बात है।
यह पूरी रिपोर्ट सिर्फ आंकड़ों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र के उस आईने की तरह है, जिसमें जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधियों की वास्तविक स्थिति को देख सकती है। सवाल यह है कि क्या यह जानकारी मतदाताओं के फैसलों को भविष्य में प्रभावित करेगी या फिर यह केवल एक और रिपोर्ट बनकर रह जाएगी।







