सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश में हो रहे अंधाधुंध विकास और पर्यावरणीय असंतुलन पर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी कि अगर राज्य में मौजूदा हालात नहीं बदले, तो हिमाचल ‘हवा में गायब’ हो सकता है। यह तीखी टिप्पणी उस याचिका की सुनवाई के दौरान आई जिसमें कुछ क्षेत्रों को ‘ग्रीन एरिया’ घोषित करने के सरकार के निर्णय को चुनौती दी गई थी।
कोर्ट ने राज्य में बेतरतीब विकास कार्यों को तबाही की जड़ बताया। चार लेन की सड़कें, सुरंग निर्माण और हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स ने राज्य की पारिस्थितिकी को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। अदालत ने कहा कि राज्य में भूस्खलन, मकानों का गिरना, और सड़कों का धंसना अब आम घटनाएं बन चुकी हैं। राजस्व बढ़ाने की होड़ में राज्य सरकारें पर्यावरण की बलि नहीं दे सकतीं।
अदालत ने हिमाचल की प्राकृतिक पहचान को खतरे में बताया। कोर्ट ने कहा कि राज्य की 66 प्रतिशत भूमि जंगलों से आच्छादित है, लेकिन तेजी से हो रहे निर्माण और अनियंत्रित पर्यटन विस्तार ने जैव विविधता और हरियाली को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो हिमाचल की भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान खत्म हो सकती है।
कोर्ट ने केंद्र और अन्य हिमालयी राज्यों को चेताया। अदालत ने सुझाव दिया कि पर्यावरणीय संकट से निपटने के लिए हिमालयी राज्यों को आपस में समन्वय बनाकर कार्य करना चाहिए। संसाधनों और विशेषज्ञों की साझा रणनीति से ही इस संकट का समाधान निकाला जा सकता है। केंद्र सरकार को भी इस मुद्दे को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। अदालत ने इस याचिका को जनहित याचिका में तब्दील करते हुए पूछा है कि अब तक क्या कदम उठाए गए हैं और आगे की क्या योजना है। अदालत ने टिप्पणी की, “जो नुकसान हो गया, वह हुआ, लेकिन अब भी अगर कोशिश करें तो हालात बेहतर हो सकते हैं।” अब यह मामला अगली सुनवाई के लिए 25 अगस्त को सूचीबद्ध किया गया है।







