भोपाल गैस त्रासदी को चार दशक बीत चुके हैं, लेकिन इसके ज़हरीले प्रभाव और उससे जुड़े सवाल आज भी न्याय की प्रतीक्षा में हैं। हाल ही में जबलपुर हाईकोर्ट में इस त्रासदी से जुड़े ज़हरीले कचरे को लेकर सुनवाई हुई, जिसमें सरकारी वैज्ञानिक संस्थाएं – नीरी, सीपीसीबी और एमपीपीसीबी – कोर्ट के सवालों का संतोषजनक जवाब देने में असफल रहीं।
जस्टिस श्रीधर की अदालत में यह मामला सुनवाई के दौरान सामने आया कि यूनियन कार्बाइड परिसर में आज भी लगभग एक टन ‘मर्करी’ (पारा) मौजूद है। यह जानकारी भोपाल गैस पीड़ित संघर्ष सहयोग समिति की संयोजक साधना कर्णिक ने साझा की। समिति के वकील ने कोर्ट में बताया कि यह मर्करी मानव जीवन के लिए अत्यंत घातक है, और इसे अब तक हटाया नहीं गया है।
वकील ने इसके समर्थन में नीरी की 2010 की रिपोर्ट और यूनियन कार्बाइड के पूर्व कर्मचारी टी. आर. चौहान की किताब “भोपाल नरसंहार: एक सच्ची कहानी” के प्रमाण भी अदालत में प्रस्तुत किए, जिसमें इस ज़हरीले कचरे में भारी मात्रा में पारा होने की पुष्टि की गई है।
हाईकोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है कि मर्करी और अन्य ज़हरीले कचरे को सुरक्षित स्थान पर लैंडफिल करने की योजना जल्द से जल्द पेश की जाए। वहीं समिति का आरोप है कि नीरी और सीपीसीबी जैसी संस्थाओं ने कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश की और कचरे की गंभीरता को कमतर बताने का प्रयास किया।
इस पूरी घटना से यह स्पष्ट है कि भोपाल त्रासदी केवल अतीत की एक दर्दनाक याद नहीं, बल्कि एक ज्वलंत वर्तमान भी है – जहाँ पीड़ित आज भी न्याय और सुरक्षित पर्यावरण की आशा में जी रहे हैं। अब समय है कि सरकार और संबंधित संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से लें और ठोस कार्रवाई करें।



