हाथों में किताबें होनी थीं, भविष्य बचाने सड़कों पर उतरे मासूम

Madhya Bharat Desk
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रायपुर। आंदोलन के मंचों से उठती आवाजें और युवाओं का हुजूम अब केवल वर्तमान का मुद्दा नहीं रह गया है। हालिया प्रदर्शनों की तस्वीरों ने एक ऐसी सच्चाई उजागर की है जो किसी को भी सोचने पर मजबूर कर दे। इस बार भीड़ में सिर्फ वे युवा नहीं हैं जो आज परीक्षा दे चुके हैं या परिणाम का इंतजार कर रहे हैं, बल्कि वे मासूम चेहरे भी शामिल हैं जो आने वाले सालों में प्रतियोगिता परीक्षाओं में बैठने वाले हैं।

किताबें हाथ में थामने की उम्र में सड़कों पर उतरे इन बच्चों की मौजूदगी सिर्फ एक बात दर्शाती है—भविष्य की गहरी चिंता और वर्तमान व्यवस्था से डगमगाता विश्वास।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर जारी छात्र आंदोलन और संसद मार्च के समर्थन में रायपुर के अंबेडकर चौक पर छात्र आंदोलन में उतरे है।

भविष्य की चिंता या तंत्र की लाचारी?

जब आने वाले वर्षों के परीक्षार्थी आज ही सड़कों पर खड़े होकर अपने हक और निष्पक्ष परीक्षा प्रणाली की मांग करने लगें, तो यह समझ लेना चाहिए कि डर की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं। इन बच्चों के चेहरों पर साफ नजर आ रहा है कि उन्हें इस बात का डर सता रहा है कि जब उनकी बारी आएगी, तब भी क्या परिस्थितियां ऐसी ही होंगी?

जब आने वाली पीढ़ी को अपनी पढ़ाई छोड़कर अपने भविष्य की सुरक्षा के लिए सड़कों पर उतरना पड़े, तो इसे किसी मजबूरी से कम नहीं कहा जा सकता।

लाठी भांजने वालों की संवेदनहीनता पर उठे सवाल

प्रदर्शनकारियों को शांत कराने या रोकने के नाम पर बल प्रयोग करने वालों पर भी अब तीखे सवाल उठ रहे हैं। जनभावनाओं और विशेषज्ञों का मानना है कि इसे लाठी भांजने वालों की मजबूरी कहिए या संवेदनहीनता, लेकिन यह रवैया कई तरह के सवाल खड़े करता है:

भविष्य के प्रति बेरुखी: क्या लाठी भांजने वाले उन अधिकारियों या कर्मचारियों को अपने ही बच्चों के भविष्य की कोई चिंता नहीं है?

संवेदनशीलता की कमी: या फिर वे इस बात से पूरी तरह अनजान हैं कि आज जो अन्याय इन छात्रों के साथ हो रहा है, कल उसका असर उनके अपने घर तक भी पहुंच सकता है?

क्या सुधरेगी व्यवस्था?

मासूम बच्चों का इस तरह आंदोलनों में शामिल होना किसी भी समाज और देश के लिए शुभ संकेत नहीं है। यह इस बात का सबूत है कि आज का छात्र केवल वर्तमान समस्याओं से नहीं जूझ रहा, बल्कि वह आने वाले कल के प्रति भी गहरे तनाव में है।

अब देखना यह होगा कि शासन और प्रशासन इन नन्हे और युवा चेहरों की लाचारी और चिंता को समझ पाता है या फिर संवाद की जगह केवल बल प्रयोग का ही सहारा लिया जाता रहेगा।

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