जगदलपुर। रत्नगर्भा बस्तर की धरती सिर्फ खनिज और वन संपदा के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए भी जानी जाती है। यहां कई ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहरें आज भी मौजूद हैं, लेकिन इनमें से कई उपेक्षा का शिकार हैं। ऐसी ही एक धरोहर है विश्व प्रसिद्ध चित्रकोट जलप्रपात के पास स्थित सिदईगुड़ी का प्राचीन शिवलिंग।
चित्रकोट जलप्रपात को देखने हर साल देश-विदेश से बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं, लेकिन बहुत कम लोग पास में स्थित इस प्राचीन शिवलिंग और इसके इतिहास से परिचित हैं। यह शिवलिंग न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
पहले बस्तर का नाम सुनते ही लोगों के मन में डर का माहौल बन जाता था, लेकिन अब हालात काफी बदल चुके हैं। नक्सलवाद में कमी आने के बाद बस्तर अब पर्यटन के लिए तेजी से उभर रहा है। यहां प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ कई ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल भी हैं, जो इस क्षेत्र की प्राचीन सभ्यता की पहचान हैं।
राजधानी रायपुर से करीब 335 किलोमीटर और जगदलपुर से लगभग 35 किलोमीटर दूर चित्रकोट जलप्रपात के समीप स्थित सिदईगुड़ी का यह विशाल मानव निर्मित शिवलिंग करीब एक हजार वर्ष पुराना माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार इसका निर्माण 11वीं शताब्दी में चक्रकोट (वर्तमान बस्तर) पर शासन करने वाले छिंदक नागवंशी शासकों ने कराया था।

पुरातत्व विभाग के अनुसार यह मंदिर लगभग एक हजार वर्ष पुराना है। पूर्वाभिमुखी इस मंदिर के गर्भगृह में वर्गाकार जलहरी पर विशाल शिवलिंग स्थापित है। यह मंदिर चित्रकोट जलप्रपात से करीब 500 मीटर की दूरी पर स्थित है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित है।
बस्तर सांसद महेश कश्यप के मीडिया प्रतिनिधि रोहन कुमार ने बताया कि यह शिवलिंग अपनी भव्यता, प्राचीन स्थापत्य कला और धार्मिक महत्व के कारण विशेष पहचान रखता है। इसे छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा मानव निर्मित शिवलिंग माना जाता है। यहां हर वर्ष महाशिवरात्रि पर तीन दिवसीय मेले का आयोजन होता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक शामिल होते हैं।
इतिहास विभाग के सहायक प्राध्यापक ओमप्रकाश सोनी का कहना है कि चित्रकोट जलप्रपात देश-विदेश के पर्यटकों का प्रमुख आकर्षण है। यदि इस प्राचीन शिवलिंग और इसके गौरवशाली इतिहास का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए तो अधिक से अधिक लोग इस ऐतिहासिक धरोहर से परिचित होंगे। इससे क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को पहचान मिलेगी और धार्मिक पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।
सनातन परंपरा से जुड़े हैं आदिवासी समाज
बस्तर आदिवासी बहुल क्षेत्र है। यहां के आदिवासी लंबे समय से जल, जंगल और जमीन के सहारे अपना जीवनयापन करते आए हैं। आदिवासी समाज ‘बड़ा देव’ यानी भगवान शिव की आराधना करता है। क्षेत्र में मौजूद कई प्राचीन मंदिर और धार्मिक स्थल इस परंपरा की झलक दिखाते हैं।
दंतेवाड़ा का मां दंतेश्वरी मंदिर, बारसूर में पहाड़ी पर स्थापित विशाल गणेश प्रतिमा, सुकमा जिले के रामाराम में भगवान श्रीराम का मंदिर, माता शबरी के नाम से जुड़ी शबरी नदी और कांकेर का कंकालीन माता मंदिर जैसे कई धार्मिक स्थल बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक हैं।
समय के साथ आदिवासी समाज की धार्मिक पहचान को लेकर अलग-अलग विचार सामने आए, लेकिन क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक परंपराएं, शिव, गणेश और अन्य देवी-देवताओं से जुड़े ऐतिहासिक स्थल इस बात का प्रमाण हैं कि बस्तर की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत बेहद समृद्ध रही है। माता शबरी की कथा भी इसी क्षेत्र की आस्था और परंपरा से जुड़ी मानी जाती है।







